पाणिनि आनंद

गर्व बुखार हो जैसे। मुद्दत हुई, हुआ ही नहीं और अब आ गया है तो उतरता नहीं, चढ़ता चला जाता है। और शर्म लगता है, घर की काकी है। इतने दिन से बनी हुई थी, अब मरी है तो वापस न लौटेगी। गर्व और शर्म के इस शास्त्रार्थ की टीका पूरब की यात्रा पर गए प्रधानसेवक अपने संबोधनों में गढ़ रहे हैं। वे गर्व से भरे हुए हैं। जीत का गर्व, उससे पहले पार्टी में एकछत्रता का गर्व, संसदीय मंडल में निर्बाधता का गर्व, पार्टी में अपने हनुमान के नायकत्व का गर्व, अपने गुरुकुल के सभी ब्रह्मास्त्रों को ठिकाने लगाने का गर्व। अपनी टीम के रक्तरंजित हाथों का धीरे-धीरे साफ और बेदाग बनते जाने का गर्व। सबूतों के दफ्न होने का गर्व और विरोधों के कमजोर पड़ने का गर्व।

गर्व से भरा सिर क्या नहीं करता… सोने के तारों से टंका-सजा कोट पहनता है, डिजाइनर कपड़े, चप्पलें और जूते, चश्मे और कलम, क्या कुछ नहीं करता गर्व की उन्मत्तता में नहाता व्यक्ति। भले चेतना प्रतिकूल होती जा रही हो, भले शब्द अब विचार की जगह बीमारी बनते जा रहे हों, गर्व बारिश के बाद जमीन की दराजों से निकले चीटों की तरह पूंछ उठाए अपने गर्व में छका हुआ घूम रहा है। वह व्याकुल है कि क्या करे। एक राज्य जीता, फिर। एक देश जीत लिया, फिर। फिर क्या, अब अश्वमेध। रथ हांका जा रहा है। सुदूर पश्चिम से उधर पूरब के प्रसार तक। नए-नए देश। अभी एक यात्रा के कपड़े सूखे नहीं होते कि रथ दूसरी यात्रा पर आगे बढ़ जाता है। राजा को अपना जयघोष पसंद है। जयघोष के लिए दुनिया भर में एक पौध तैयार है। राजा रथ पर बैठ कर नए-नए देशों में जाता है। वह ऐसे चलता है जैसे बहुत संपन्न, उत्तम और परिमार्जित जीवनशैली और राजप्रासाद उसके स्वभाव का हिस्सा हैं। वह उस वैभव का राजसी प्रदर्शन करता चलता है। उसकी चाल में एक अहं है, इतराहट है। उसकी भाषा में शब्दकृपणता है। वह वही-वही बातें दोहराता है, जो उसके मन के सिनेमा का हिट फार्मूला हैं। उसे केवल कहना है, सुनना नहीं है। इसलिए अपने लिए वह पहले से गढ़े बिंबों की अगली पीढ़ी गढ़ता चलता है। इसमें यज्ञ के सफलकाम होने की व्याकुलता उसे गर्व से भर देती है। शेष सब शर्म हो जाता है। जन्म भी, प्रयोग भी, इतिहास भी, गति और दिशा… सब केवल शर्म।

शरीर और मानस की यह अजीब-सी रासायनिक स्थिति है, जिसमें गर्व चेतना की छाती पर चढ़ बैठा है और शर्म के लिए नेपथ्य में भी जगह नहीं रह जाती। इसी जगह गर्व को अहंकार बनने में देर नहीं लगती। आप जिसे एक वर्ष के प्रतिफल का गर्व कह रहे हैं, वह आपका अहंकार भी है और अलंकार भी। इस अहंकार में ऐसे हजारों उदाहरण आपको गर्व से भर जाने से पहले विचलित नहीं कर सकते जो वास्तव में हमारी सच्चाई हैं और शर्मनाक हैं। इस अहंकार के खटोले पर बैठ कर आप बड़ी आसानी से कह सकते हैं कि जमीन पर कुछ भी नकारात्मक नहीं है। न किसान मर रहा है, न मजदूर टूट रहा है, न संसाधन लुट रहे हैं, न जमीनें हड़पी जा रही हैं, न खतरे में स्वदेशी और कुटीर उद्योग हैं और न ही युवाओं को रोजगार का संकट। आर्थिक नीतियों से लेकर अलग-अलग पहचानों के अस्तित्व तक आपको कुछ भी ऐसा लगता नहीं, जिसके लिए शर्मसार होना पड़े। गाय आपकी, गंगा आपकी, गायत्री आपकी, योग आपका, विकास आपका, जो कुछ बन रहा है, बढ़ रहा है, संभला है और सुंदर है, सब आपका। राजा के सब, सब राजा के। इतना सारा गर्व है।

सोचिए, गर्व की जगह शर्म का बोध आपके मानस को नियंत्रित करता तो कैसा होता। आप सोचते कि अधनंगों के देश में इतना सूट-बूट पहन कर इतराना कितना शर्मनाक है। आपको लगता कि यह कितना शर्मनाक है कि मैं न तो महिलाओं को सुरक्षा दे पा रहा हूं, न किसानों को उम्मीद। न मजदूर को काम दे पा रहा हूं और न हाथों को रोजगार। यह कितना शर्मनाक है कि मेरे देश में आज भी एक भी घर में ऐसा पानी मैं नहीं पहुंचा पाया, जो पीने के योग्य हो। यह कितना शर्मनाक है कि गंगा जैसी नदी बांधों के जबड़ों में जकड़ कर मार दी जा रही है, मैं उसको मां कहता हूं, उसकी आरती करता हूं और फिर भी कुछ नहीं कर पा रहा हूं। जब किसानों की आत्महत्या की खबर कानों में पड़ती तो थाली से मुंह तक निवाला लाते हाथ शर्म से कांप उठते और पकवानों से भरी थाली पत्थर की तरह भारी लगती। आर्थिक नीतियों ने पिछले कुछ दशकों में जिस तरह इस देश के बहुमत को दीमक की तरह खोखला और कमजोर किया है, उसको देख कर शर्म आती या ऐसा कभी खयाल में आता कि जनादेश के बावजूद यह कितना शर्मनाक है कि देश की आबादी का एक हिस्सा आज भी मेरे नाम की कल्पना भर से सहम जाता है। ऐसी कितनी ही बातों की शर्म अगर आंखों और जेहन में होती, तो गर्व की गाथा हठ की प्रमेय नहीं रच रहा होता।

ऐसा गर्व, जो किसी एक व्यक्ति, किसी एक औद्योगिक घराने, किसी एक दिमाग के संकुल तक सीमित हो, क्या ऐसे गर्व पर शर्म नहीं आनी चाहिए।

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