मनोज कुमार
नाटक को कला रूपों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसे रचते, संवाद बोलते, रंगमंच पर आंगिक और शारीरिक अभिनय करते हुए न केवल जीवन और समाज की स्थितियों को प्रस्तुत करते हैं, बल्कि इस पूरे क्रम में नाट्य प्रक्रिया में शामिल व्यक्तियों के चिंतन-मनन और व्यवहार में व्यापक सकारात्मक फर्क उत्पन्न करते हैं। दर्शक तो खैर नाटक का प्रभाव और संदेश ग्रहण करते ही हैं, बशर्ते समर्पित निर्देशक की परिकल्पना सटीक ढंग से क्रियान्वित की गई हो। यह समूची प्रक्रिया तब और रोमांचक हो जाती है, जब नाटक करने वाली छात्राएं हों, नाटक मौलिक हो और निर्देशक के पास विचार के अलावा और कुछ न हो।
मुझे दो महिला कॉलेजों में काम करने का अवसर मिला है। महिला कॉलेजों में एक खास किस्म के अनुशासन के साथ सांस्कृतिक गतिविधियां होती रहती हैं। खैर, कुछ समय पहले इंद्रप्रस्थ महाविद्यालय में ‘गीता गंजुम नाट्य प्रतियोगिता’ के तहत छात्राओं का सहयोग करने की जिम्मेदारी दी गई थी। छात्राएं ‘आधे अधूरे’ समेत कई वजनदार नाटक लिए बैठी मिलीं। सीमित समय में अभ्यस्त कलाकार और मंजे हुए निर्देशक के बगैर इस नाटक के द्वंद्व को साकार कर पाना मुझे मुश्किल लगा। हमने अपने समाज की ज्वलंत समस्या को विषय बना कर मौलिक नाटक प्रस्तुत करने का फैसला किया। झूठी इज्जत के नाम पर लड़कियों की हत्या की घटनाओं को आधार बना कर हमने पटकथा विकसित करने का सामूहिक काम शुरू किया।
कुछ दिनों में हमारे पास अखबारों की कतरनें थीं और धीरे-धीरे आकार लेता कथानक और पात्र। मसलन, प्रेमी-प्रेमिका, खाप पंचायत का मुखिया, पांच लठैत, एक सभ्य दिखता आदमी, कुछ असामाजिक तत्त्व आदि। मजे की बात है कि छात्राएं खुद ही नए पात्र बना लेती थीं। मसलन, लड़की पर सामाजिक दबाव दिखाने के लिए माता-पिता को मंच पर उतारा गया जो आसपास स्त्रियों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं के हवाले से लड़की के कॉलेज की पढ़ाई छुड़ा सकें। हिंदुत्व के ‘विचारकों’ द्वारा लड़कियों के मनपसंद वस्त्र पहनने की आजादी पर नकारात्मक टिप्पणी कराई गई तो एक छात्रा ने कहा- ‘अब एक मुल्लाजी भी होने चाहिए सर’!
फिर एक मौलाना का चरित्र विकसित कर मुसलिम लड़कियों के शिक्षा ग्रहण करने, पहनावे के चयन पर आक्रोश व्यक्त करवाया गया। बहुत सारे संवाद छात्राओं ने ही तैयार किए। उदाहरण के तौर पर प्रेम और लोकतंत्र के पक्ष में यह संवाद- ‘यह लोकतंत्र का जमाना है। तुम अपनी मनमानी नहीं कर सकते। तुम्हें अपने विरोधी विचारों को उदारता से स्वीकार करना होगा।’ इसी तरह सामंती ताकतों के प्रतिनिधि पात्रों के लिए कुछ संवाद छात्राओं ने तैयार किए- ‘तुम्हारी वजह से हमारी बहू-बेटियां हमारा कहना नहीं मानतीं’ और ‘मैं तो कहता हूं मुखियाजी, इन्हें पेड़ से उलटा लटका कर नीचे आग जला देते हैं।’
इसी क्रम में एक छात्रा नौशीन ने प्रेम दृश्य के लिए कुछ स्वरचित संवादपरक काव्य पंक्तियां पेश कीं। इसमें पे्रमिका कहती है- ‘कब तक तुम मुझे ऐसे ही देखते रहोगे?’ प्रेमी जवाब देता है- ‘देखता रहूंगा तब तक, जब तक निस्सीम गगन का सिरा नहीं मिल जाता, इस सृष्टि से प्रेम नहीं हो जाता खत्म…!’ आंखों में अनबुझे सत्य की तलाश की कोशिश है। प्रेरणा ग्रहण करने और चुनौती स्वीकार करने का भाव है। इन पंक्तियों के भाव तब ज्यादा अहम हो जाते हैं जब यह पता चलता है कि इसकी प्रेरणा उस प्रेमी-प्रेमिका की हत्या है, जिनसे नौशीन जुड़ी हुई थी। पंक्तियां शोकगीत जैसी हैं। मार दिए गए प्रेमी-प्रेमिका की आंखें निस्सीम गगन के सिरे की तरह अलगा दी गर्इं, पर चुनौती को स्वीकार किया गया- ‘इस सृष्टि से प्रेम नहीं हो जाता खत्म।’
मैं इन पंक्तियों के भाव और उसकी प्रेरणा को जानने के बाद कई दिनों तक विचलित रहा। आखिर क्यों मार दिया गया उन बच्चों को? क्या गुनाह था उनका? मैं उनके सपनों के बारे में सोचता रहा। उनके सपने मामूली ही रहे होंगे। घर बनाने के, साथ रहने के। क्या इन सपनों के लिए ही किसी को मार देना धर्म और संस्कृति की रक्षा है? और जिस समाज में बच्चों को ही मार दिया जाना नैतिकता, गोत्र और रक्त शुद्धता की रक्षा के लिए एक मानक है, वह समाज कैसा है? उस समाज के धर्म, मूल्य और लोग कैसे हैं? अगर धर्म करुणा, प्रेम, परहित के लिए है तो हमारे समाज में खाप जैसे विचार ही क्यों? बाद में इस नाटक में ग्रामीण क्षेत्र में स्थित अदिति महाविद्यालय की छात्राएं भी जुड़ीं। अलग-अलग पांच जगहों पर प्रदर्शन के बाद दर्शकों ने ‘रोंगटे खड़े होने’ जैसी प्रतिक्रियाएं दीं। कितना कुछ किया जाना शेष है अभी इस समाज को उदार, लोकतांत्रिक और समानतापूर्ण बनाने के लिए, ताकि प्रेम करने के लिए बच्चों की हत्या करने का आधार खत्म हो!
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