सुधा मिश्र

अपनी किशोरावस्था में एक कहावत अक्सर सुनती थी कि बच्चों को पढ़ाएं तो पढ़ाएं, नहीं तो शहर दिखाएं। अब इतने सालों के अनुभव के बाद इस नतीजे पर पहुंची हूं कि बच्चों के लिए आप कुछ करें, लेकिन जरूरी यह भी है कि साल में एक बार उन्हें अपने पुरखों की जन्मभूमि पर ले जाएं। एक सालाना रूटीन जैसा बना लें कि जीवन की जरूरतों को पूरा करने के लिए रहें भले शहर में, लेकिन हर साल गरमी की छुट्टियों में गांव जाएंगे। यह केवल इसलिए जरूरी नहीं है कि हमारे बच्चे फिल्मी गांव के बदले असली गांव को देख पाएं, बल्कि वे अपनी संस्कृति से भी रूबरू हो पाएं। आज भी गांव में लोग कम पढ़े-लिखे हैं, लेकिन उनमें अपने और आसपास के लोगों और पारंपरिक मूल्यों के प्रति समर्पण और मेलजोल ज्यादा है।

संयुक्त परिवार आज भी गांवों में ही बचा है। गांव जाने पर पता चलता है कि किस तरह हमारे किसान अपने खून-पसीने से खेती करके हम सबके लिए अन्न उपजाते हैं, फसलें कैसे होती हैं। शहर में तो पालतू जानवर के नाम पर केवल कुत्ता दिखता है, गांव में अपनी-अपनी जरूरत के घरेलू जानवर होते हैं, जो बच्चे फिल्मों में देखते हैं या कहानियों में पढ़ते हैं। आज बैलों की अहमियत इसलिए कम हुई है कि ज्यादातर खेती ट्रैक्टर आदि आधुनिक उपकरणों से होने लगी है। हालांकि देश के अनेक पिछड़े या गरीब कहे जाने वाले राज्यों के अनेक गांवों में आज भी काफी खेती हल और बैल से की जाती है। हमारे ससुराल में तो कई तरह के घरेलू जानवर आज भी हैं।

हमारा गांव और ससुराल ज्यादा दूर नहीं है। यह गांव 1917 में महात्मा गांधी के सत्याग्रह के चलते मशहूर हुए बिहार के पुराने चंपारण और अब के पूर्वी चंपारण जिले में आता है। मैं बच्चों को हर साल गांव ले जाने का आग्रह इसलिए भी कर रही हूं कि जब तक बच्चे गांव नहीं जाएंगे और उनमें अपने पुरखों की जमीन के प्रति लगाव नहीं बढ़ेगा, तब तक वे गांवों की अहमियत नहीं समझ पाएंगे। विकास की गलत परिभाषा का विरोध हम-आप नहीं कर पाए और अगली पीढ़ी भी अगर ऐसे ही कटती गई तो भविष्य में गांव सिनेमा में ही दिखेंगे।

संपन्नता और आधुनिकता का मतलब बन चुके शहरीकरण की परिभाषा बदलनी होगी। गांवों को केवल सड़कों से जोड़ कर और हर समय बिजली उपलब्ध कराने का काम सरकारें करें तो गांव अपने आप विकसित हो जाएंगे। आधा से अधिक जीवन मेरठ और दिल्ली में गुजारने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंची हूं कि हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से बिहार इसलिए पिछड़ा है कि वहां न तो सड़कें हैं और न बिजली। जैसे-जैसे दोनों चीजें गांवों में पहुंचती जा रही हैं, लोगों का पलायन कम होता जा रहा है। इसकी अगली कड़ी होगी खेती आधारित उद्योगों को बढ़ावा देना। फिर गांव भी शहरों से मुकाबला करने लगेंगे।

गांव में प्रदूषण से लेकर सामानों में मिलावट भी कम है। आज समाज में बदलाव का एक सुखद असर गांवों यह दिखने लगा है कि लोगों के बीच अपने बच्चों को ज्यादा से ज्यादा पढ़ाने की होड़ लगी हुई है। कई मौके ऐसे आते हैं, जब गांव के लोग हमें जीवन का बेहतरीन पाठ पढ़ा जाते हैं। आज भी गांव में कोई अनजान व्यक्ति आ जाए तो लोग आमतौर पर उसका स्वागत ही करते हैं। हर व्यक्ति पर शक करने की आदत शहरों में होती है। मैंने तो शुरू से एक नियम-सा बना लिया था कि बच्चों की गरमी की छुट्टी गांव में ही बितानी है। गरमी में थोड़ी कठिनाई होती थी, लेकिन गिल्ली-डंडा से लेकर कबड्डी और गांव के अन्य खेलों में उनकी बेखौफ भागीदारी मुझे अब भी रोमांचित करती है।

अब बच्चे बड़े हो गए हैं। मेरे माता-पिता और सास-ससुर अब नहीं रहे, फिर भी मैं गांव जाने का कोई मौका नहीं छोड़ती। यह निश्चित रूप से उनके लिए कष्टप्रद होगा कि जिनका गांव किसी न किसी कारण से छूट गया, उनके लिए किसी गांव से संबंध जोड़ना कठिन होगा। लेकिन जिनका गांव अभी भी है, उनसे मेरा आग्रह है कि हर साल एक बार संभव हो तो बच्चों की गरमी की छुट्टी में या पर्व-त्योहार के समय गांव जरूर जाएं। फिर उन्हें उन बातों को अलग से बताने की जरूरत नहीं पड़ेगी, जिनकी कमी के चलते परिवार टूट रहे हैं। संयुक्त परिवार के संस्कार और गांव की मिट्टी से जुड़ने का आनंद तो गांव में ही मिल सकता है। अगली पीढ़ी पर इसे बचाए रखने की भी जिम्मेदारी है। लेकिन उन्हें अपनों से जोड़े रखने की जिम्मेदारी हमारी भी है।

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