सुमन केशरी

पिछले दिनों टीवी देखते हुए एक चैनल पर ध्यान अटक गया। वहां ‘राज्य के योगीराज’ रामदेव दो मिनट में कुछ योगासनों के बारे में बता-दिखा रहे थे। यह देख कर जो पहली प्रतिक्रिया दिमाग में आई, वह एक पुरानी कहावत है- देखा-देखी साधे जोग, छीजी काया बाढ़े रोग।

आप में से बहुतों ने यह कहावत सुनी होगी और योग को अपनी शारीरिक क्षमता, मानसिक स्थिति और समय की उपलब्धता आदि के अनुसार विधिवत सीखने-करने का प्रयास किया होगा। योग में शरीर और मन दोनों का बहुत महत्त्व है। इसमें आसनों की मुद्रा के साथ सांस लेने, बाहर निकालने का भी नियम होता है। अगर कोई किसी बीमारी से ग्रस्त है, तो योगाचार्य या तो उस व्यक्ति को कुछ आसनों को करने से मना कर देते हैं या उनका कोई आसान रूप बता देते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है कि बीमारी बढ़े नहीं या व्यक्ति किसी दूसरी बीमारी का शिकार न हो जाए।

जैसे अगर कोई व्यक्ति रीढ़ के दर्द से परेशान है, उसके घुटनों में दर्द है तो कहा जाता है कि ऐसा व्यक्ति किसी ऊंची और मुलायम जगह पर योग करे, ताकि वह सीधे जमीन से उठने पर होने वाली परेशानियों से बच जाए। इसी तरह घुटने में दर्द वाले व्यक्ति के लिए आलथी-पालथी मारना या पद्मासन करना भी मना होता है। फिर कितनी देर योगाभ्यास किया जाए, यह भी शारीरिक क्षमता और समय की उपलब्धि पर निर्भर होता है। ऐसा करना उचित नहीं कि आप टू मिनट्स नूडल या फास्ट फूड की तरह योग भी ताबड़-तोड़ कर लें और एक हाथ में सैंडविच, दूसरे में स्टेयरिंग और कान पर मोबाइल लगाए गंतव्य की ओर दौड़ जाएं।

टीवी पर ‘राज्य के योगीराज’ अपना ढीला-ढाला पंचा संभालते हुए पीठ के दर्द से संबंधित अनेक आसनों को आधे-अधूरे ढंग से किए जा रहे थे। पंचे की वजह से उचित ढंग से करने की कोई गुंजाइश नहीं थी और फिर दो मिनट में सात-आठ आसन बता देना कोई साधारण जन का काम भी नहीं- क्यों, है क्या? तो वे जिस रफ्तार से बोल रहे थे, उसकी दोगुनी रफ्तार से कर रहे थे। वे दो मिनट में सारा ज्ञान उलीच देने की मुद्रा में थे।

मुझे याद आया अपना बचपन, जब देश में पहली बार दूरदर्शन पर धीरेंद्र ब्रह्मचारी का योगासन संबंधी कार्यक्रम प्रसारित हुआ था। धीरेंद्र ब्रह्मचारी आसनों के बारे में बताते थे और उनके दो शिष्य एक-एक आसन को अच्छी तरह कर के दर्शकों को दिखाते थे। इस कार्यक्रम ने योग को लोकप्रिय बनाने का सिलसिला शुरू किया था। उनके आश्रम और अन्य जगहों पर जाकर लोग बकायदा योगशिक्षकों से योग सीख सकते थे। खुद मैंने अपनी सखी और उसके परिवार के साथ जाकर वहां अनेक आसन सीखे थे। पर इसके बावजूद जब मैंने व्यक्तिगत स्तर पर योग सीखा, तो पता चला कि कई आसन मुझे करने ही नहीं हैं और उनमें से एक है- विवादास्पद सूर्य-नमस्कार! घुटने के दर्द वाले को अगर घुटनों पर बल लगाना पड़े तो क्या होगा, इसे समझने के लिए रॉकेट साइंस को जानना जरूरी नहीं है। हो सकता है कि इसका भी कोई आसान रूप हो, पर वह टीवी के सामने बैठ कर सीखने-करने से तो पता नहीं चलेगा। उसके लिए किसी जानकार से गहराई से बात करने पर ही पता चलेगा और बताएगा आपका शरीर, जब आप उन आसनों को करेंगे। इस दौरान कई बार सलाह लेने की जरूरत भी पड़ती है।

टीवी के ऐसे कार्यक्रम हमें प्रेरणा देने के लिए हैं। जब हम अपनी बीमारी के इलाज के लिए योग्य डॉक्टर तलाशते हैं, तो योग भी विधिवत सीखें और अपने शरीर और मन से भी राब्ता कायम करें। अगर आसनों को शरीर के विभिन्न अंगों से बात करते हुए किया जाए तो शरीर हमें बताता है कि उसे क्या चाहिए और कितना। वैसे यह आम नजारा है कि लोग पार्कों में भी कान में ईयरफोन लगाए, संगीत या कुछ सुनते हुए समय बिताने का उपाय किए रहते हैं। चिड़ियों की आवाजें, बहती हवा में पेड़ों-वनस्पतियों के हिलने की ध्वनि यह सब अब लोगों को आमतौर पर बांधते नहीं। उसके लिए तो विशेष रूप से कार्यक्रम बना कर मित्रों-रिश्तेदारों को बता-जता कर भरतपुर, सरिस्का या किसी अन्य वन-अरण्य में जाना होता है। यह भी क्या बात हुई कि जिस पार्क में आप रोज-रोज जा रहे हों वहां ‘बोरिंग’ चिड़ियों-बिल्लियों की आवाजें सुनें! इसमें कोई रोमांस है क्या? तो शरीर-मन पर ध्यान लगाना तो ‘हाउ बोरिंग’ ही ठहरा न? तो योग नहीं ‘योगा’ करते हुए ‘आदित्या’ को देखना, ‘पवना’ के झोंकों को महसूस करना आउट-डेटेड होने की निशानी है। राज्य के योगीराज इस मंत्र को जान गए हैं, इसीलिए उन्होंने ‘टू मिनट्स योगा’ के मंत्र को भी धारण कर लिया है। पर जान लीजिए, टू मिनट्स नूडल की तरह ही है यह टू मिनट्स योगा भी!

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