सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी
पीएचडी की उपाधि किसी भी विषय के गहन अध्ययन और सूक्ष्म सोच-विचार के बाद अनेक पहलुओं को उजागर करने के लिए दी जाती है जो अभी तक अनछुआ और अनजाना रहा हो। एक सच्चा शोधार्थी इन्हीं सब बातों के प्रति जागरूक रहते हुए ईमानदारी से शोध प्रबंध लिखता है। पर ऐसे ईमानदार प्रयास और खोज अपवाद के तौर पर ही देखने को मिलते हैं। आज धड़ल्ले से सभी विषयों में पीएचडी की जा रही है। क्या वास्तव में अचानक ज्ञान का सागर फूट पड़ा है? जब से कॉलेज शिक्षकों के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने पीएचडी अनिवार्य कर दिया है तब से तो पीएचडी करने वालों की बाढ़-सी आ गई है। दूसरी ओर, एक जांच के बाद कई कुल सचिवों और कुलपतियों तक की थीसिस की नकल पाई गई।
अमूमन हर विषय में ऐसे विषयों पर थीसिस लिखी जा रही है और पीएचडी मिल रही है जिन विषयों पर आमतौर पर निबंध लिखे जाते हैं। जैसे कि ‘एचजी वेल्स एज ए नोवेलिस्ट।’ अब इसमें खोज क्या है और नई बात क्या है! निबंधकार को निबंधकार, कवि को कवि और नाटककार को नाटककार बताते हुए थीसिस लिखना और पीएचडी लेना यही दर्शाता है कि यह खेल खानापूर्ति और नौकरी में पदोन्नति के लिए खेला जा रहा है। इसका ज्ञानोपार्जन से कोई संबंध नहीं है।
प्राध्यापक अपने खाते में पीएचडीधारियों का इजाफा कर रहे हैं और शोधार्थी उपकृत हो रहे हैं। मैंने सुना है कि कुछ लोग पच्चीस-तीस हजार रुपए लेकर थीसिस लिखने का काम भी कर रहे हैं। ऐसे विषयों पर थीसिस लिखी जा रही है, जिनका पाठ्यक्रम से कोई संबंध नहीं है और न ही उससे उच्च शिक्षा के किसी उद्देश्य की पूर्ति होती है। एक साहब को मैं जानता हूं जो कि पांच विषयों में पीएचडी हैं और छठे में करने जा रहे हैं। दरअसल, बहुत कम शोध प्रबंध सही अर्थों में शोध या खोज की श्रेणी में आते हैं। वरना ज्यादातर नकल या फिर इधर-उधर से सामग्री जुटा कर नकल उतारने से अधिक कुछ नहीं हैं। यह अकादमिक जालसाजी या धोखाधड़ी नहीं तो और क्या है?
पता नहीं क्यों, यूजीसी पीएचडी की अनिवार्यता की असलियत नहीं समझता। अब जब से पीएचडी के पहले एक लिखित परीक्षा पास करने का प्रावधान किया गया है, तब से पीएचडी की आपाधापी में कुछ कमी जरूर आई है। पर मुख्य मुद्दा व्यक्ति का पढ़ाने का कौशल है। बिना पीएचडी किया हुआ व्यक्ति भी एक अच्छा शिक्षक हो सकता है और पीएचडी प्राप्त व्यक्ति भी अच्छा शिक्षक नहीं हो सकता। बल्कि डिग्रीधारी व्यक्ति अगर कक्षा में अच्छा नहीं पढ़ा पाएगा तो उसकी पोल ही खुलेगी। आपको हर जगह ऐसे शिक्षक मिलेंगे जो पीएचडी किए बिना भी इतना अच्छा पढ़ाते थे कि उन्हें लोग भूल ही नहीं पाते। डूब कर पढ़ना और पढ़ाना शायद बीते युग की बात हो गई है।
विश्वविद्यालय और कॉलेजों में विभिन्न विषयों के शिक्षकों और विद्यार्थियों में एमए में अधिक से अधिक विद्यार्थियों को प्रथम श्रेणी दिलवाने की प्रतिस्पर्धा शुरू हुई। फिर एमए के प्रीवियस में अच्छे नंबर लाने वालों को फाइनल में एक पेपर कम लेकर लघुशोध प्रबंध लिखवाने का प्रावधान शुरू हुआ। लघुशोध प्रबंध नब्बे फीसद पहले के किसी शोध प्रबंध की नकल या फिर थोड़ा फेरबदल कर वैसा ही टाइप करवाने की बहादुरी थी। जब कुछ शिक्षकों ने इस सामूहिक नकल अभियान को बंद करने की बात की तो उन्हें दकियानूसी और विद्यार्थी विरोधी करार दिया गया। अब उसी की पुनरावृत्ति पीएचडी के आकर्षक गणवेश में हो रही है। आप प्रशिक्षण और डिग्री से अच्छा पढ़ाने की कला तो सिखा सकते हैं, पर अच्छा शिक्षक नहीं बना सकते। पढ़ाने का कौशल तभी संभव है जब अच्छा संप्रेषण हो, बोलने में सफाई हो, उच्चारण शुद्ध हो और दूसरों को समझा पाने की कला आती हो। जटिल बातों को सरल शब्दों में कह देना आना चाहिए। शिक्षण यानी रोचक अंदाज में सरलीकरण का कौशल।
शोध की दृष्टि जरूरी है। आपका सोच शोधपरक हो। इच्छा के लिए पीएचडी का शोध प्रबंध जरूरी नहीं है। डॉक्टर होना व्यक्तिगत उपलब्धि है, पर यह सार्थक तभी होगा जब शोध स्तरीय और उच्चकोटि का हो और व्यक्ति खुद उसे जरूरी समझ कर करे। अवश्यंभावी बता कर जबरन पीएचडी करवाने का अर्थ इस गुण का अवमूल्यन करना ही है। शोध के नाम पर खिलवाड़ बंद होना चाहिए। पीएचडी सिर्फ व्यक्तिगत साज-सज्जा की चीज होकर रह गई है।
फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta
ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta