जाबिर हुसेन
कयास कीजिए कि आप नालंदा से पाटलिपुत्र की दूरी सड़क-मार्ग से तय कर रहे हैं। शाम के साढ़े पांच-छह बज रहे हैं। दिन-भर की तपिश हलकी हो चली है, धूल के कण सड़क के दोनों ओर सूखे, बंजर-जैसे खेतों पर फैल गए हैं। कयास यह भी कीजिए कि डेढ़-दो घंटे का यह सफर आप अपनी कार से तय कर रहे हैं। कार के सलेटी शीशे ऊपर तक चढ़े हैं और एअरकंडीशनर से निकल रही ठंडी हवा आपके थके बदन को राहत पहुंचा रही है।
अचानक, किसी मोड़ पर नालंदा से पाटलिपुत्र जाने वाली पतली और इकहरी सड़क एक चौड़ी, खूबसूरत, चार बाजुओं वाली सड़क से आ मिलती है। खेतों की सतह से इस सड़क की ऊंचाई अच्छी-खासी है। सड़क ज्यों-ज्यों पाटलिपुत्र की तरफ बढ़ती है, थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बसे गांव-टोले छोटे दिखने लगते हैं। कच्ची-पक्की दीवारों से घिरे छोटे-मझोले घर के ओसारों पर बैठी स्त्रियां तेजी से भागती गाड़ियों को देख आपस में कुछ कहती महसूस होती हैं। तेज रफ्तार से भागती गाड़ियों के बंद शीशों के पीछे से झांकते चेहरों के लिए उनकी इस बातचीत का कयास लगाना इतना आसान नहीं होता।
लेकिन इससे पहले किसी लहर पैदा करने वाले मोड़ पर आपकी नजरें बार्इं ओर आकाश में आग के एक गोले से टकराती हैं। आग में तपा रोशनी का यह खूबसूरत गोला, कयास कीजिए कि आपकी गाड़ी के साथ ही आगे की तरफसरक रहा है। बीच-बीच में आपकी कार आग और रोशनी के इस गोले से आगे निकल जाती है। ऐसा चार बाजुओं वाली इस फैलाव-भरी सड़क के घुमाव के कारण ही हो रहा है।
कयास कीजिए कि आप नालंदा से पाटलिपुत्र की तरफन जाकर पाटलिपुत्र से नालंदा जा रहे हैं। तब आग का यही रोशन गोला आपको सड़क के दार्इं ओर नजर आएगा। बार्इं या दार्इं ओर दिखने मात्र से आग के इस गोले में आप कोई अंतर नहीं महसूस करेंगे। तब भी वह एक-जैसा चमत्कार पैदा करने वाला गोलाकार पिंड ही नजर आएगा। नालंदा से पाटलिपुत्र! दो खंडहरों के बीच का बजाहिर यह छोटा फासला आहिस्ता-आहिस्ता कम हो रहा है। लेकिन आग का वह रोशन और आबदार गोला अब भी आपका सफर-सितारा है। इसके अंदर से निकलने वाली आग की चिंगारियों में पहले जैसी तीव्रता नहीं रह गई है। धीरे-धीरे ये चिंगारियां शीतलता में तब्दील हो रही हैं।
आग का यह पिंड जमीन पर अपनी छाया नहीं छोड़ता। लोगों को समंदर या नदी की सतह पर इसका अक्स जरूर दिख जाता है। आप जिस रास्ते पाटलिपुत्र जा रहे हैं, वहां समंदर तो नहीं ही है, नदियां भी पानी के मरे हुए सोते की तरह हैं। इसलिए आग के इस तपे हुए पिंड को आप अपनी खुली आंखों से थोड़े समय के लिए भी नहीं देख सकते हैं।
कयास कीजिए कि आज की शाम एक धुंधलके में बदल रही है। कार चालकों ने बत्तियां जला ली हैं। दूसरी ओर से आने वाली बड़ी गाड़ियां, सामान ढोने वाले वाहन तेज-तेज आवाज में फिल्मी गाने बजा रहे हैं। सड़क के दरमियानी हिस्से में हाल ही में लगाए गए हरे पौधे अपनी जड़ों की मिट्टी से अच्छी तरह हिल-मिल गए हैं। उधर आकाश में आग का गोला सरक कर नीचे की तरफजाता नजर आ रहा है। आप पाटलिपुत्र की बाहरी सरहदों के करीब आ गए हैं। यहां से आप पाटलिपुत्र के खंडहरों के दर्शन जरूर कर सकते हैं। सड़क की बार्इं तरफ पुरातत्त्व वालों का इश्तिहारी बोर्ड आपको बता रहा है कि आप पाटलिपुत्र आ चुके हैं।
एअरकंडीशनर आपने बंद कर दिया है। कार के शीशे आपने गिरा दिए हैं। सड़क के बार्इं ओर आपने उत्सुकता भरी नजरों से आकाश की तरफदेखने की कोशिश की है। ट्रैफिक के शोर के बीच आप अपनी गर्दन घुमा कर आकाश में आग के उस रोशन गोले को तलाश रहे हैं। आपकी नजरों के सामने है खुला आकाश, लेकिन आग का वह सुर्ख, रोशन और आबदार गोला कहां है! वह कहां पीछे छूट गया! नालंदा से पाटलिपुत्र तक आपका हमसफर रहा आग का वह गोलाकार पिंड जाने किस गुफा में छिप गया है!
दो खंडहरों के बीच फैले हजारों वर्ष के इतिहास की कई जीवंत आकृतियां आपको उद्वेलित कर रही हैं। दूर आकाश में आग का वह रोशन गोला आपकी याददाश्त में उभरने वाली आकृतियों को एक नए जीवन का संदेश दे रहा है।
कयास कीजिए कि आप पाटलिपुत्र पहुंच चुके हैं और रिक्त मन से अपने घर की ओर बढ़ रहे हैं। कयास कीजिए, क्योंकि कयास पर ही कायम है यह दुनिया!
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