प्रेमपाल शर्मा

नई सरकार ने गद्दी संभालते ही बड़े धुआंधार ढंग से स्वच्छता अभियान शुरू किया है, गांधी से लेकर ईश्वर का नाम लेते हुए। बहुत अच्छी बात है। महात्मा गांधी ने भी दक्षिण अफ्रीका में कदम रखते ही अपना सामाजिक जीवन स्वच्छता अभियान से शुरू किया था। लेकिन भारत में यह करना लोहे के चने चबाने जैसा है। देश की राजधानी दिल्ली के पास के एक शहर में पूरी निष्ठा से अभियान शुरू किया गया।

पहले कदम के तौर पर शहर भर में कूड़ेदानों की व्यवस्था की गई। उन्हें एक उचित दूरी पर जगह-जगह लगाया गया, क्योंकि सबसे बड़ी समस्या यही है कि आप मनमर्जी कूड़ा फेंकना नहीं चाहते, तब भी उसे डालेंगे कहां! जनता का सहयोग मिला। कूड़ेदान भरने लगे। फिर अहसास हुआ कि ये खाली भी तुरंत होने चाहिए। गाड़ियों की व्यवस्था की गई और मजदूरों की भी जो तुरंत खाली कर सकें। कभी-कभी कूड़ेदान में इतना कूड़ा होता कि उसे उलटने में परेशानी होती। इसीलिए तुरंत ऐसे कूड़ेदान बनवाए गए जो हलके हों और मजदूरों को उलटने में आसानी हो। लेकिन कुछ ही दिन बीते कि नई समस्या आ खड़ी हुई। कूड़ेदान में कुछ शरारती तत्त्व माचिस की तीली जला कर डाल देते और कूड़ेदान स्वाहा हो जाता। अब व्यवस्था के सामने यह चुनौती कि वह ऐसे कूड़ेदान बनवाए जो हलके हों और माचिस की तीली से न जलें। यह उदाहरण बताता है कि सरकार अगर करना भी चाहे तो जब तक समाज पूरा सहयोग नहीं देता, तब तक चीजें मुश्किल से आगे बढ़ती हैं।

हाल ही में उत्तर प्रदेश के बिजनौर का किस्सा आपने सुना होगा, जब चोर बैंक की पूरी एटीएम मशीन को ही उखाड़ कर ले गए। गनीमत रही कि वे मशीन को नहीं तोड़ पाए। कितना सुंदर स्वप्न है गांव-गांव बैंक लगाने और एटीएम की व्यवस्था, जिससे न किसी जमींदार का हाथ जोड़ना पड़े और अपने पैसों को बैंक में सुरक्षित भी रख दें। उत्तर प्रदेश में काम कर रहे एक और डॉक्टर युगल बताते हैं कि गरीबों के बीच वे बीमारियों के इलाज और दवाओं के लिए कैंप लगाते थे। प्रचार के बूते सैकड़ों लोग आते, लेकिन उनकी कोशिश होती कि कागज, दवाएं जो कुछ भी मुफ्त मिल जाए, उसे लेकर आगे बढ़ जाएं, भले उनकी जरूरत हो या न हो।

सरकार की नीयत के बावजूद बहुत सारी योजनाओं का फायदा समाज को उस स्तर पर नहीं मिला, जितना कि मिलना चाहिए था। वह स्वच्छता हो या सर्वशिक्षा अभियान। यह चुनौती हिंदी प्रदेशों में दक्षिण के मुकाबले और भी बड़ी है। कुछ साल पहले बिहार में कोसी नदी में भीषण बाढ़ आई थी। हजारों-लोग बेघरबार हो गए थे। एक कथाकार-संपादक मित्र भी वहीं फंस गए थे। सभी मित्रों के सामने बड़ी संकटपूर्ण चुनौती थी कि किस तरह प्रशासन या अधिकारियों से बात करके उन्हें निकाला जाए। वे निकल तो आए, लेकिन उन्होंने जो कहानियां बतार्इं, उन्हें सुन कर किसी का भी सिर शर्म से झुक सकता है। बाढ़ से बचाने या नाव से पार कराने के लिए वहां के कुछ लोगों ने एक-एक आदमी से हजारों रुपए वसूले। ऐसे में सरकारी व्यवस्था भी क्या करे जब जनता ही लूटने पर उतारू हो जाए। रेल दुर्घटनाओं आदि के मौके पर ऐसे किस्से सुनने को मिलते हैं। ये उस देश के नागरिक हैं जिन्हें राष्ट्रभक्ति, नैतिकता, गीता का ज्ञान, रामायण के उदाहरण कंठस्थ हैं, लेकिन विपत्ति के किसी भी क्षण इनकी नैतिकता की पोल खुलने में देर नहीं लगती।

लेकिन समाज में उजले उदाहरणों की भी कोई कमी नहीं है। बाढ़ कोसी के बाद मुंबई में भी आई थी। पूरा शहर अंधेरे में डूब गया था। बताते हैं कि बीस-बीस मंजिला भवनों में बिजली फेल होने से लिफ्ट भी काम नहीं कर रही थी। हजारों बुजुर्ग और बच्चे फंसे हुए थे। यहां कॉलेज, स्कूल के बच्चों ने सीढ़ियां चढ़-चढ़ कर मदद पहुंचाई। एक और वाकया। एक टैक्सी वाले ने पूरी रात बाढ़ में डूबे लोगों को मदद पहुंचाई। जिसने भी पैसे देने चाहे, उसका विनम्र उत्तर था- ‘अल्लाह, ईश्वर ने मुझे यह काम सौंपा है। क्या इसके बदले में कोई फीस लूं?’ ऐसे उदाहरण कोसी की बाढ़ के दौरान भी रहे होंगे। यह अलग बात है कि वे सामने नहीं आ पाए। यों अनुभव यह भी बताते हैं कि हवाई जहाज या ट्रेन में किसी बुजुर्ग को सामान उठाने में अगर तकलीफ हो तो भारतीय से पहले विदेशी मदद के लिए आगे आते हैं। पता नहीं कौन-सी शिक्षा है जिसमें ऋषि, मुनियों के तत्त्व-ज्ञान की बातें तो की जाती हैं, जीवन के इन सामान्य पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया जाता। जरूरत इस बात की है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में ये जीवित प्रश्न पढ़ाए जाएं, उन्हें पुरस्कृत किया जाए। न कि हम अपनी पीढ़ियों को उन पुराणों के बोझ से लादें जो आधुनिक मनुष्य की पूरी संवेदना को ही कुंद बना रहे हैं।

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