विष्णु नागर
दूर के एक रिश्तेदार ने अपने बेटे के विवाह का लाल भड़कीला-चमकीला निमंत्रण-पत्र भेजा है। वे उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं और उनके सभी रिश्तेदार-जानने वाले भी आमतौर पर हिंदीभाषी हैं। मगर निमंत्रण-पत्र अंगरेजी में है, ताकि रोब दिखे कि आपको हिंदी वाले किसी मामूली आदमी नहीं, एक अंगरेजीदां के घर बुलाया गया है। अंगरेजी से निमंत्रणकर्ता का वास्ता ‘हाऊ डू यू डू’ तक ही है। निमंत्रण पत्र भेजने वाले ने अपने नाम के बाद उस पद का भी उल्लेख किया है जिसे वे कभी सुशोभित करते थे! यों उनका पद कोई रोबदार भी नहीं था। हालांकि जो लोग उनके यहां शादी में आएंगे, वे उनसे और उनके परिवार से आत्मीय संबंधों के कारण ही आएंगे। राहत यह है कि बेटे और होने वाली बहू का पदनाम नहीं दिया गया है।
लेकिन बात इतनी ही होती तो हम इस मामले को व्यक्तिगत रहने देते। इस शादी के निमंत्रण-पत्र के बहाने अपनी बात कहने का कारण यह है कि इसमें सात फेरे के समय पत्नी से लिए जाने वाले सात वचन भी प्रकाशित करवाए गए हैं। यों कुछ वर्ष पहले इन सज्जन की सुयोग्य कन्या का विवाह हुआ था, तब उन्हें ये सात वचन याद नहीं आए थे। ये वचन एक तरह से भावी पति की ओर से अपनी भावी पत्नी से अपेक्षाओं, आकांक्षाओं, इच्छाओं का सूचीपत्र या शर्तनामा है। यह कुछ उसी तरह का एकतरफा करारनामा है, जिस पर नौकरी देने से पहले मालिक अपने भावी कर्मचारी से और प्रकाशक अपने भावी लेखक से दस्तखत करवाते हैं।
इन वचनों का निमंत्रण-पत्र में प्रकाशन इन पूर्व पदाधिकारी महोदय की उसी तरह की अपनी मौलिक सूझ नहीं रही होगी, जिस तरह से इसमें वर-वधू का अनौपचारिक कपड़ों में चित्र का प्रकाशन भी नहीं है। उन्होंने कहीं से यह विचार चुरा लिया होगा। लेकिन किसी की नकल में सही, इन सात वचनों का प्रकाशन उनकी ठस समझ का प्रतिबिंब है। हो सकता है कि प्रकट रूप से उन्होंने निमंत्रण-पत्र में नवीनता लाने के लिए यह ‘प्रयोग’ किया हो और इससे वे बहुत खुश भी हों, मगर ऐसी मानसिकता के ढेरों लोग हैं जो अपने बेटे की शादी के निमंत्रण-पत्र में इसकी नकल करना जारी रख सकते हैं।
बहरहाल, निमंत्रण-पत्र में प्रकाशित पहला वचन है- ‘जैसे ही हम पहला फेरा लेते हैं, तुम मेरी जीवनसंगिनी, गृहस्वामिनी और पथ-प्रदर्शक बन जाती हो’। ऊपर से यह वचन स्त्री के प्रति सम्मान का सूचक लगता है। मगर इसके निहितार्थ में जाएं तो साफ है कि भावी पत्नी को तो भावी पति महोदय की सब कुछ बन जाना है, मगर भावी पति महोदय को भावी पत्नी का पति बनने के अलावा कुछ नहीं बनना है। इस वचन में पति द्वारा पत्नी को अधिकार देने का अहं, उसका दाता-भाव साफ झलकता है। यों व्यावहारिक जीवन में देखें तो कितने पति यह कल्पना भी कर सकते हैं कि उनकी पत्नी उनकी पथ-प्रदर्शक हो सकती है?
दूसरे वचन में पति कहता है कि ‘दूसरे फेरे में तुम मेरी शक्ति बन जाती हो’! तो पत्नी से पति महोदय को शक्ति चाहिए, ताकि इस शक्ति को भी हासिल करके वे पत्नी पर हुक्म चलाया करें।
तीसरे फेरे के समय पति महोदय कहते हैं- ‘तुम मेरी लक्ष्मी बन जाती हो और मेरी समृद्धि बढ़ाने का वचन देती हो’। यानी पत्नी का कुल काम आज भी घर को ठीक से संभालना है, जिससे पति समृद्ध बने। वह खुद कमाने, अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व विकसित करने के लिए आजाद नहीं है।
चौथे फेरे में यह वचन है कि ‘तुम मेरी स्वास्थ्य रक्षक बन जाती हो और मैं तुम्हारे संरक्षण में फलूंगा-फूलूंगा’। क्यों भाई! अकेले पति के स्वास्थ्य की रक्षा ही क्यों जरूरी है और पति का ही फलना-फूलना क्यों आवश्यक है? क्या पति का स्वास्थ्य ही पत्नी का स्वास्थ्य है? पत्नी का अपना स्वास्थ्य क्या कोई मायने नहीं रखता? यह कौन-सा दर्शन है?
पांचवें फेरे में पत्नी वचन देती है कि वह हर परिस्थिति में पति का साथ देगी। हर परिस्थिति यानी मरते-जीते पत्नी तो पति का साथ दे और पति को पत्नी का साथ देने की कोई जरूरत नहीं!
छठे फेरे में वचन मांगा जाता है कि ‘तुम मेरे जीवन की चारों ऋतुओं को खुशियों से भर दोगी।’ खुशी भी पति को ही चाहिए, यौवन से बुढ़ापे तक!
इतने वचन लेने के बाद सातवें फेरे में पति महोदय कहते हैं- ‘हम जीवनभर के लिए एक हो जाएंगे’। एक इसलिए हो जाएंगे कि पहले के छह फेरों में पत्नी अपना सर्वस्व पति को दे चुकी होगी। जाहिर है, भावी पत्नी से तो सात वादे करवाए जाते हैं, मगर भावी पति एक भी वादा नहीं करता। पत्नी की हैसियत यहां सिर्फ इन वचनों को चुपचाप स्वीकार करने वाली एक इकाई की है।
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