रागिनी नायक

कुछ समय पहले नेपाल में भूकम्प के बाद अफवाहों का बाजार गरम हो गया। मोबाइल पर संदेशों से लेकर सोशल मीडिया का इस्तेमाल अफवाहों के प्रचार में किया जाने लगा कि अगला भूकम्प कहां, कितनी देर में और कितने बजे आएगा। प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले जानमाल के नुकसान से बचने के लिए समुचित तंत्र विकसित करने के प्रयास दुनिया भर में चल रहे हैं। आसन्न आपदा की सूचना समय रहते मिल जाए तो बचाव के उपाय किए जा सकते हैं, लेकिन अफवाह के असर से बच पाने का कोई उपाय नहीं है। अनुकूल वातावरण मिलने पर वह इतनी विशाल, व्यापक और गतिवान हो जाती है कि उसके कहर से होने वाली तबाही किसी सुनामी की तरह भूकम्प के कहर से कम नहीं होती। जैसे प्राकृतिक आपदा का पूर्वानुमान मुश्किल है, वैसे ही अफवाह का पूर्वाभास भी टेढ़ी खीर है, क्योंकि उसके फैलने का अंदाजा फैलाने वालों के अलावा किसी को नहीं होता। अफवाह के जनक बेचेहरा, बेपहचान होते हैं।

असद जैदी ने लिखा है कि चालाकी भी एक किस्म की मूर्खता है। अफवाह के प्रतिपादन का आधार शुद्ध रूप से चालाकी है या मूर्खता, यह निर्धारित करना कठिन है। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि षड्यंत्रकारी मनोवृत्ति और झूठ को प्रसारित करने की तलब अफवाह को पंख देती है। कहावत है कि झूठ के पांव नहीं होते। झूठ पर आधारित अफवाह भी चलती या दौड़ती नहीं, उड़ती है। शायद इसीलिए उसे हवा भी कहा जाता है। आपसी बातचीत में लोग अक्सर कहते हैं कि हवा उड़ रही है या हवा फैली है। इसी संदर्भ में एक किस्सा याद आता है जो अगाध स्मृति वाले विदग्ध हमारे कक्काजी दिवंगत शारदा पाठक सुनाते थे। दूसरे महायुद्ध के दौरान भारत के सारे संसाधन अंगरेजी सरकार ने लड़ाई में झोंक दिए थे। बाजारों में माल नहीं था, लेकिन अफवाहों का कारोबार रात-दिन चलता रहता था। जबलपुर में एक दिन अफवाह फैल गई कि रात को जापान के कई हवाई जहाज बम गिराने आ रहे हैं। लोगों ने सारी रात बेचैनी में राम-भजन करते काटी। हुआ यों कि अगले दिन खुशकिस्मती से एक लड़के की खोटी चवन्नी चल गई। मारे खुशी के वह ‘चल गई, चल गई’ चिल्लाते हुए दौड़ा। लोगों ने समझा कि गोलियां चल गर्इं। फिर क्या था, पूरे शहर की दुकानें फटाफट बंद हो गर्इं और बाजार में सन्नाटा छा गया।

यह भी मानी हुई बात है कि युद्ध में अफवाहें दुश्मन का मनोबल तोड़ने में तोप के गोले का काम करती हैं। कई बार तो हारी हुई लड़ाई भी अफवाहों के दम पर जीत ली जाती है। महाभारत में अश्वत्थामा के मरने की खबर फैलाने का उपक्रम युद्ध जीतने के लिए अफवाहों के इस्तेमाल का बढ़िया उदाहरण है। आजकल तो राजनीतिक लड़ाइयां भी अफवाहों के जरिए जीती जा रही हैं। जनता को लुभाने के लिए दिखाए जाने वाले सब्जबागों की नींव भी अफवाहें ही हैं। आज का राजनीतिक परिवेश इस बात की पुष्टि करता है कि ‘अच्छे दिन’ और वैकल्पिक राजनीति के वादे, काले धन और भ्रष्टाचार से मुक्ति की कवायद केवल चुनाव जीतने के लिए फैलाई गई अफवाहें थीं। विडंबना यह है कि स्पष्टीकरण मांगने पर सत्ताधारियों का जवाब यही आता है कि सरकारी विफलता असल में विपक्ष द्वारा फैलाई गई अफवाह है।

दिलचस्प है कि अनेक लोगों, समूहों और संगठनों का कारोबार ही अफवाहों के दम पर चलता है। वीडी सावरकर की प्रेरणा से 1925 में स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पूरा नाम बहुत कम इस्तेमाल होता है। उसे आमतौर पर आरएसएस कहा जाता है, जो रोमन अक्षरों में उसका संक्षिप्त नाम है। संसदविद् मधु लिमये कहते थे कि आरएसएस का पूर्ण रूप दरअसल ‘रियूमर स्प्रैडिंग सोसाइटी’ यानी अफवाह फैलाने वाला संगठन है।

जाहिर है, अफवाहें खास मकसद से फैलाई जाती हैं। कभी-कभी अपने अफवाही नेटवर्क को परखने के लिए भी यह किया जाता है, जैसा आरएसएस ने गणेश की मूर्तियों के दूध पीने का शिगूफा छोड़ कर किया था। लेकिन इसके पीछे भी धर्मांधता फैलाने का उद्देश्य तो था ही। धर्म दरअसल अंधों का हाथी है, जिसे हर कोई अपने ढंग से समझता है। धर्म को धर्मोन्माद के रूप में फैलाने वालों की भरमार है। इस धर्मोन्माद के फलने-फूलने में भी प्राणवायु का काम चमत्कारी अफवाह करती है। धर्म के नाम पर स्वार्थों की दुकान चलाने वाले इसका भरपूर फायदा उठाते हैं। वे तर्क-वितर्क को कुतर्क घोषित करते हैं, वैज्ञानिक ज्ञान को अविश्वसनीय बताते हैं, धार्मिक-मिथकीय कथाओं से ‘जेनेटिक साइंस’ का घालमेल करते हैं, गणेश के सिर को प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी का उदाहरण बताते हैं और अपनी दुकान में बिकने वाली दवा के बारे में अफवाह फैलाते हैं कि उससे मूक वाचाल हो जाते हैं और पंगु गहन गिरिवर चढ़ जाते हैं!

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