अमित चमड़िया
पहले भी अक्सर नजर जाती थी, हाल ही में एक दिन फिर दीवार पर चिपके इस परचे पर नजर पड़ी- ‘किसी भी समस्या के समाधान के लिए मिलें। चंद घंटों में ही निवारण, नहीं तो पैसा वापस।’ इस पंक्ति के नीचे किसी ‘बाबा’ की तस्वीर, नाम और मिलने का ठिकाना बाकायदा फोन नंबर के साथ। इस तरह के विज्ञापन लगभग हर जगह बसों, रेलगाड़ियों और सार्वजनिक स्थानों पर चिपके हुए आसानी से मिल जाते है। कुछ हिंदी अखबार भी इस तरह के विज्ञापन छापते हैं। दिल्ली जैसे तमाम महानगरों में भी ऐसे विज्ञापन आसानी से पढ़ने को मिल जाते हैं।
हर विज्ञापन कुछ कहता है। कई विज्ञापन समाज में हो रहे बदलाव के सूचक भी होते हैं। इसलिए इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि लोग अपनी-अपनी समस्याओं को लेकर इन बाबाओं से नहीं मिलते होंगे। यों भी हमारे समाज में अंधविश्वास की जड़ें पहले से ही काफी गहरी हैं, जहां आज भी महिलाओं को डायन बता कर हत्या करने की खबरें खूब पढ़ने को मिलती हैं। अगर आप एक पत्थर के ऊपर सिंदूर और चावल वगैरह डाल देते हैं तो कुछ देर बाद ही लोगों की लाइन पत्थर के दर्शन के लिए खड़ी हो जाती है। धीरे-धीरे कुछ दिन बाद पत्थर एक मंदिर की शक्ल ले लेता है।
खैर, दिल्ली के किंग्सवे कैंप इलाके में एक बड़े बोर्ड पर लिखे एक विज्ञापन पर नजर पड़ी। बोर्ड इस तरह से लटका हुआ था, जैसे किसी दुकान के आगे लटका होता है। उस पर लिखा था- ‘इंद्रप्रस्थ की बात, एक टीवी न्यूज एवं डेली न्यूज पेपर। ब्यूरो चीफ- चिंटू वर्मा। किसी भी समस्या समाधान के लिए’। जैसे ही इस विज्ञापन पर मेरी नजर पड़ी मुझे वही बाबाओं वाले विज्ञापन दिमाग में आने लगे। लेकिन इस बोर्ड पर लिखे विज्ञापन के क्या मायने हो सकते हैं?
क्या एक समाचार चैनल और अखबार चलाने वाले पत्रकार का काम भी बाबाओं जैसा ही हो गया है, जो पैसे के लिए आपकी ‘किसी भी समस्या’ का इलाज कर सकता है? क्या समाज में मीडिया की छवि इसी तरह की बन रही है? हालांकि अगर ऐसी छवि बन भी रही हो तो इसमें आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए। वर्तमान समय में मीडिया द्वारा, खासकर टीवी चैनलों पर अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र से जुड़े जो कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं, उससे तो इसी तरह की छवि समाज में बनेगी। क्या मीडिया केवल पैसा कमाने का जरिया हो गया है?
दरअसल, आज मीडिया और खासतौर पर टीवी चैनलों के ज्यादातर हिस्से ने जो रवैया अपना लिया है, उसमें यह साफ है कि उसके कार्यक्रमों से सामाजिक सरोकार धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं। इस तरह के विज्ञापन का दिल्ली के वैसे इलाके में दिखना, जहां पढ़ने-पढ़ाने वालों की संख्या ज्यादा रहती है, मीडिया में हो रहे बदलाव का सूचक है। कुछ महीने पहले बिहार के एक बड़े प्रादेशिक चैनल पर बगहा स्थित वाल्मीकिनगर बाघ अभयारण्य से जुड़ी खबर देख रहा था। इस चैनल का नेटवर्क कई राज्यों में फैला हुआ है। रिपोर्टर इस क्षेत्र में लकड़ी की तस्करी के बारे में बता रहा था। इस खबर में वह अपने सिर पर लकड़ी का गट्ठर लिए एक बूढ़ी गरीब महिला को तस्कर के रूप में दिखा रहा था। शायद उस रिपोर्टर को यह नहीं मालूम कि तस्करी शब्द का मतलब लकड़ी के छोटे-छोटे टुकड़ों के एक गट्ठर को ढोना नहीं होता है। वह गट्ठर उस गरीब के भोजन पकाने के लिए है। तस्करी हमेशा छिप कर की जाती है, जबकि वह महिला बड़े आराम से उस रिपोर्टर के पास से जा रही थी।
बिहार के एक शहर सासाराम में लगे एक राजनीतिक दल के बड़े पोस्टर को देख कर आज की पत्रकारिता का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस पर देश के प्रमुख हिंदी दैनिक के स्थानीय संस्करण से जुड़े एक पत्रकार की तस्वीर छपी थी। नीचे लिखा था- ‘वरिष्ठ नेता सह पत्रकार’। एक पत्रकार के इस भूमिका में होने को कितना उचित ठहराया जा सकता है? उत्तर प्रदेश के मुगलसराय के एक इलाके से गुजरने वाली सड़क पर लटके बोर्ड पर कुछ इस तरह से लिखा था- ‘खबरों के लिए संपर्क करें’। इसके नीचे पत्रकार का नाम और फोन नंबर लिखा हुआ था।
इसमें कोई शक नहीं कि आज भी पत्रकारिता के एक हिस्से ने सरोकार और ईमानदारी बचा कर रखी है और लोगों का भरोसा इसीलिए कायम है। लेकिन सच यह है कि कुछ लोग मीडिया का परदा ओढ़ कर समूचे पत्रकारिता जगत की छवि को नुकसान पहुंचा रहे हैं। अगर इसके भीतर ही मंथन और सुधार की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई तो भविष्य का अंदाजा लगाया जा सकता है।
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