राजकिशोर
यह दंभ मत पालो कि दूसरों को तुमने पहचान लिया है। क्या तुम्हें कोई और पहचान पाया है?
कुछ चीजें सोचने में सुंदर लगती हैं- करने में वीभत्स।
किताब पूरी हो जाने के बाद लेखक का बोझ उतर जाता है : पाठक का बोझ बढ़ जाता है।
जिस पर विश्वास करते हो उस पर थोड़ा शक करो; जिस पर तुम्हें शक है, उस पर विश्वास करके देखो: नतीजा वही निकलेगा।
ऐसे किसी व्यक्ति को दोस्त का दर्जा मत दो, जिसके साथ तुमने कम से कम साठ साल नहीं बिता लिए हैं।
जिससे तुम प्रेम करते हो, उससे थोड़ी-सी भी घृणा नहीं करते, तो तुम्हारा प्रेम बचकाना है।
हर जानवर जानता है कि उसे क्या खाना है। आदमी इस मामले में अभी तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सका है।
अतिरेक संभव नहीं है: तुम वहीं तक दौड़ सकते हो जहां तक दौड़ सकते हो।
पैसे और दोस्त में चुनाव करना हो, तो पैसे का करो: दोस्तों को पैसे के तराजू पर नहीं तौला जा सकता।
आदमी से घृणा करो, उसके कामों से नहीं, क्योंकि वे काम तो कोई भी आदमी कर सकता है।
जिसे तुम चाहते हो उसका मूल्यांकन मत करो: मूल्यांकन करने पर किसी को भी प्यार नहीं किया जा सकता।
जेलों से इसीलिए दुर्गंध आती है, क्योंकि सजा पाने वाला और सजा देने वाले, दोनों एक ही संस्कृति से आते हैं।
कुत्ते महीनों या वर्षों से किसी को काटने की योजना नहीं बनाते।
किसी को उधार देने के पहले यह मत सोचो कि वह लौटा पाएगा या नहीं, यह देखो कि उसकी जरूरत कितनी सच्ची है।
पुरुष सोचते हैं कि स्त्रियां उन्हीं के लिए बनाई गई हैं, स्त्रियां सोचती हैं कि पुरुष उन्हीं के लिए बनाए गए हैं: स्त्री-पुरुष का झगड़ा यहीं से शुरू होता है।
कवि जो बात एक पंक्ति में कह देता है, वह कहने के लिए उपन्यासकार को कम से कम पांच सौ पृष्ठ चाहिए।
कोई इसलिए जान नहीं देता कि वह चीज बहुत बड़ी है, वह इसलिए जान देता है कि उसके बिना वह रह नहीं सकता। वरना छोटी-छोटी चीजों पर जान देने वाले कहां से आते हैं?
वेश्याएं स्वतंत्र नहीं हैं: उनका पेशा ही उन्हें गुलाम बनाता है।
घृणा के स्तर होते हैं: प्रेम या तो होता है या नहीं होता।
ऐसे लोग भी एटलस देखते रहते हैं, जिन्हें कहीं नहीं जाना है।
दर्शक मत बनो: खेलो। देखना दूसरे की हथेली पर पड़ी हुई मिठाई पर रेंगना है।
कोई भी गुरु अपने शिष्य से नाराज नहीं हो सकता जैसे पेड़ अपने पत्ते को खुद नहीं गिरा सकता।
क्षमा करने की कोई सीमा नहीं हो सकती जैसे अपराध करने की कोई सीमा नहीं होती।
आलोचक का काम यह बताना नहीं है कि कौन-सी कृति अच्छी है: उसका काम यह बताना है कि कोई कृति क्यों अच्छी है।
लेखक अपने को कैसे जान सकता है? यह काम उसके पाठकों का है।
हम सिर्फ आवश्यकता का चुनाव कर सकते हैं: उसके बाद वह अपना रास्ता खुद बनाने लगती है।
तृष्णा और तृप्ति के बीच सिर्फ एक शब्द की खाई होती है: वह शब्द है- किस्मत।
प्रतीक्षा भी कर्म है।
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