सुमेरचंद

हर साल पर्यावरण दिवस आकर गुजर जाता है। लेकिन ऐसा लगता है यह चिंता कुछ औपचारिक वक्तव्यों से ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाती। शायद ही कोई ठोस कदम पर्यावरण बचाने के लिए उठाया जाता हो। आम आदमी की तो दूर, ‘स्वच्छ भारत अभियान’ का नारा देने वाले हमारे शीर्ष नेताओं तक को वास्तव में पर्यावरण को लेकर ईमानदारी से कोई फिक्र नहीं होती। वे बड़े-बड़े सम्मेलनों में भाषण पढ़ देने को ही अपनी जिम्मेदारी समझ बैठते हैं और पर्यावरण बचाने के औपचारिक मौकों पर अपने नाम से छपे विज्ञापन देख कर और एक-दूसरे को फूलों के गुलदस्ते भेंट कर खूब खुश होते हैं।

इतने बड़े पैमाने पर फूलों की बर्बादी की जाती है कि कई बार लगता है कि यह पर्यावरण बचाने या उसकी फिक्र करने का कौन-सा तरीका है। जबकि आज छोटा बच्चा भी समझता है कि डाल पर खिला फूल मुस्कराता है और दूसरों को भी मुस्कराने के लिए मजबूर करता है। डाल से टूटने के थोड़ी देर बाद ही फूल कूड़े के ढेर में चला जाता है। सवाल है कि क्या फूलों की ‘हत्या’ किए बिना लोग एक-दूसरे से मिलने का सुख नहीं प्राप्त कर सकते? क्या लाखों फूलों का जीवन छीने बिना किसी मंच की सजावट नहीं की जा सकती? क्या रोजाना बेजान कर दिए जाने वाले इतने फूल पर्यावरण का विशेष भाग नहीं हैं? पर्यावरण बचाने की यह कैसी जिम्मेदारी है जिसमें हंसते फूलों को समय से पहले मार दिया जाता है?

हर कोई चाहता है कि पीने का पानी और सांस लेने की हवा शुद्ध हो और उसका घर साफ-सुथरा दिखाई दे। पीने का पानी नदी, नालों या कुएं से मिलता है। मगर क्या हम अपने नदी-नालों को साफ रखते हैं? नगरों का मल-जल कहां जाता है? अध्ययन बताते हैं कि गंगा नदी की हरकी पौड़ी का पानी पीने लायक नहीं रहा। जिस नदी के तट पर देश की राजधानी बसी है, वह गंदे नाले का रूप ले चुकी है। कुएं अगर कहीं बचे भी हैं तो उन्हें बरसाती पानी ने मिट्टी और कचरे से भर कर मैला बना दिया है। नतीजतन, बीमारियां राज कर रही हैं।

हवा का हाल भी अलग नहीं है। अप्रैल के अंत तक गेहूं की फसल कट गई थी। अखबारों में खबर छपी थी कि ‘गेहूं के फांस जलाना अपराध है।’ मगर उस दौरान ऐसे खेत आमतौर पर देखे जा सकते थे कि जिसमें आग की लपटें और धुएं के बादल उठ रहे थे। ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारी धुएं के बीच से गुजरते रहे और कानून किसी किताब में पड़ा सिसक रहा था। यह केवल किसी खास मौसम का मामला नहीं है। कहीं भी इसे लेकर फिक्र नहीं दिखती। ऐसे वातावरण में सांस लेने की हवा कैसी होगी और हमारा स्वास्थ्य कैसा रहेगा? कानून के मुताबिक हरे वृक्ष को काटना अपराध है। मगर काटे गए हरे वृक्षों से लदी ट्रॉलियां नगर के आरा मशीन पर खड़ी देखी जा सकती हैं।

इसके अलावा, वाहनों की संख्या दिन-रात बढ़ रही है। ज्यादातर बस्तियों में घरों के आगे कार या मोटर साइकिल लगी दिख जाती है। हालत यह है कि सड़कों पर वाहनों के चलने से लेकर उन्हें खड़ी करने तक की जगहों की कमी हो रही है। मगर कारों या वाहनों की इस बढ़ती संख्या पर लगाम लगाने की बाबत तो सोचते तक नहीं। इस देश में ज्यों-ज्यों पढ़े-लिखे लोगों की संख्या बढ़ी है, हम पर्यावरण के दुश्मन बनते गए हैं। जबकि शिक्षित लोगों को पर्यावरण के बारे में ज्यादा पता होना चाहिए और उन्हें कम से कम हानि पहुंचाने के बारे में सोचना चाहिए। मगर अक्सर कई लोग अखबार में अपना नाम पढ़ने के चक्कर में पर्यावरण दिवस जैसे मौके पर पौधे लगाने का नाटक करते हैं और फिर उसके बाद सब कुछ भूल जाते हैं। ऐसा क्यों है कि जब हमारा समाज एक दौर में ‘अनपढ़’ माना जाता था, तब पर्यावरण ज्यादा सुरक्षित और स्वस्थ था और इस तरह हम भी सेहतमंद थे!

आज गंगा-यमुना की सफाई के नाम पर हजारों करोड़ रुपए बहाए जा चुके हैं। अब फिर दूसरे उपाय किए जा रहे हैं। लेकिन गंगा या यमुना की सेहत दिनोंदिन और खराब होती जा रही है। हमारे घर में छोटा बच्चा पैदा होता है। वह जिस हवा में सांस लेता है, वह उसे बीमार कर देती है। इसके साथ-साथ कुछ और वजहों से हर पांचवें बच्चे की मौत हो जाती है। सवाल है कि हवा और पानी को कौन साफ रखेगा? क्या डिजिटल इंडिया या इंटरनेट या जन-धन योजना उसे साफ कर देगी? क्या ट्विटर पर लिखे गए संदेशों से सफाई की जाएगी? वक्त रहते पर्यावरण के नाम पर पाखंड करने से अगर नहीं बचा गया, तो आने वाले दिनों में हमारा सांस लेना भी दूभर हो जाएगा!

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