विष्णु नागर

कोई क्या पहनता है, क्या नहीं, यह उसका व्यक्तिगत मामला है। नैतिकता के ठेकेदारों को हमेशा ठेंगा दिखाते रहना जरूरी है, जिनमें से अधिकतर की नैतिकता कपड़ों तक सिमटी रहती है। युवा तो हमेशा से कुछ नया और अलग पहनते हैं। वे काफी हद तक नए ढंग से सोचते भी हैं क्योंकि उनके पास अनुभव नए होते हैं और नई दृष्टि भी। हालांकि यह पूरा सच नहीं है। यों पूरा सच किसके पास होता है? जो मानता है कि उसके पास निश्चित रूप से है, उसके पास तो बिल्कुल नहीं होता।

बहरहाल, यहां बात युवाओं के कपड़ों को लेकर की भी नहीं जा रही है। बात यहां हमारी कुछ जड़ताओं की है, जिनमें नया-नया इजाफा होता रहता है। जैसे आजादी के छह दशक से ज्यादा हो गए, मगर वकील-जज यह तय नहीं कर पाए कि उन्हें अदालत में काले कोट की जगह गरमियों में क्या पहनना चाहिए, तो इसे विनम्रतावश उनका दुर्भाग्य मानना चाहिए। इन सबसे इतर हमारे नेता किस बात से मजबूर हैं? न जाने कितने नेता जुलाई की इस पसीने वाली गरमी में भी कुर्ते पर बंडी पहने रहते हैं, जिसके सारे बटन बंद होते हैं।

सही है कि हममें से अधिकतर वह नहीं रहे, जो आजादी के बाद थे। बचपन में मेरे कस्बे के कांग्रेसी-जनसंघी नेता, विधायक या तो पैदल चलते थे या साइकिल पर। कोई भी उन्हें रास्ते में कहीं रोकता-टोकता था तो वे रुक जाते थे। उनमें से कुछ अपने जमाने के हिसाब से भ्रष्ट भी रहे होंगे। मगर वे सबको सामान्य रूप से उपलब्ध जरूर होते थे। इसलिए मई से जुलाई-अगस्त तक की गरमियों में कोट या बंडी पहनने की वे सोच भी नहीं सकते थे। वह जमाना गया। आज नेता लोग बड़ी-बड़ी कारों में घूमते हैं, तो हम मध्यवर्गीय में से भी बहुत से ऐसी ही कारों में ठाठ से घूमते हैं।

मगर नेताजी, आप यह बताइए कि आप तो जनता के प्रतिनिधि हैं न? आप चुनाव जैसे भी लड़ते हों, मगर आपमें से जो जीतते हैं, वे विधानसभा या संसद में जाते हैं। आप कम से कम औपचारिक रूप से तो हमारे प्रतिनिधि हैं ही! लेकिन आप दिनोंदिन हर तरह से हमसे इतनी दूर होते जा रहे हैं? ठीक है कि आप एसी के बगैर नहीं रह सकते, मगर एसी में भी तो बगैर कोट या बंडी के रहा जा सकता है! आपमें से कुछ रहते भी हैं। कपड़ों के शौकीन और इस कारण भी चर्चित रहे प्रधानमंत्री खुद कई बार इस मौसम में बिना बंडी के दिखने की कृपा कर देते हैं, मगर उनकी ही पार्टी के कई मंत्री, नेता इस भयंकर पसीनेदार गरमी में भी बंडी चढ़ाए रहते हैं। क्यों भाई? कोई स्वास्थ्य संबंधी समस्या है आपको? ऐसी किसी बीमारी के बारे में आज तक सुना तो नहीं, मगर यह बीमारी ढेर सारे नेताओं को है! इससे मुक्त होने के लिए देश के कर्णधारों को इस पर तत्काल ध्यान देना चाहिए!

आप कहेंगे कि आप हमें ही निशाने पर क्यों लेते हैं? क्या बड़े-बड़े अफसर, पूंजीपति और भी तमाम भद्र लोग कोट-बंडी नहीं पहनते? उनसे तो आप कहते नहीं! हां, यह सही है। हम नहीं कहते। लेकिन सच यह है कि उन पर हमारा जोर नहीं चलता। जोर तो आप पर भी नहीं चलता, मगर आपसे कहने का अधिकार रखते हैं हम। यह भी हम देखते हैं कि दिल्ली की भयानक ठंड के दिनों में कुछ धनी-मानी संपन्न लोग भी बहुत कम कपड़ों से काम चला लेते हैं। कुछ को कंधे पर शाल टांगे देखा जा सकता है, लेकिन उसे वे ओढ़ते नहीं हैं। पता नहीं, बेहद ठंड में इस तरह रहने पर वे बीमार होते हैं या नहीं! लेकिन जो हमारे नुमाइंदे नहीं, उनके मामले में हम क्यों दखल दें!

मगर हमारे नेताजी लोग लगातार भद्र दिखने की कोशिश में रहते हैं। विधानसभाओं या संसद में, और अब तो बाहर भी अक्सर उनके व्यवहार में कोई भद्रता नजर नहीं आती। मगर वे भद्र और संपन्न हैं। सवाल है कि इसका सार्वजनिक प्रदर्शन करना आखिर क्यों जरूरी है? मालूम है कि हमारे नेताजी लोग जीवन भी पांच सितारा जीते हैं। असंभव न हो तो ठहरते-रहते पांच सितारा में हैं। अब भ्रम का परदा बनाए रखने से भी उन्हें परहेज है। लेकिन अब हम उनकी असलियत के बारे में क्या सोचते हैं, यह हम पर छोड़ दिया जाए!

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