निवेदिता

जिंदगी ने दुनिया के कुछ मुल्कों के दो-चार शहरों को देखने का मौका दिया। जब कनाडा के एक प्यारे शहर मिसीसागा पहुंची तो लगा ही नहीं कि यह शहर अनजान है। शाखों पर पत्ते नहीं, पर बारिश की नन्ही बूंदें मोतियों की तरह लटकीहुई थीं। दिन की रोशनी में आसमान कभी सिंदूरी, कभी जाफरानी, कभी पीलापन लिए हुए था। लगभग एक हफ्ते कनाडा की खूबसूरती में भीगती रही। एक विशाल झील, नीले और हरे रंगों में झिलमिलाती हुई। जब सूरज की किरणें पानी में पैबस्त होकर ऊपर उभरना चाहतीं तो झील का रंग गहरे हरे रंग में बदल जाता। वहां से जब चले तो पानी के चश्मे जगह-जगह हमारे साथ चलते रहे। मुझे फारसी के मशहूर शायर उर्फी की पंक्ति याद आई जो उन्होंने कभी कश्मीर के बारे में लिखी थी- ‘वहां जली-भुनी चिड़िया भी पहुंच जाए तो उसके पंख और पर निकल आते हैं।’ लेकिन यह बात मैं नियाग्रा जलप्रपात के बारे में कहना चाहती हूं, जिसके जादुई असर से हम निकल नहीं पाए। कनाडा बहुत हद तक हिंदुस्तान का हिस्सा ही लगता है। हिंदुस्तानी, पाकिस्तानी और बांग्लादेशी लोगों से भरा है मुल्क। सड़क के दोनों जानिब एक जैसी खूबसूरत इमारतें, जिनके मेहराबों के नीचे कुछ बुजुर्ग टहलते मिल जाते थे। बड़ी अजीब उदास, नर्म धीमी-धीमी तहजीब थी। कहीं कोई शोर नहीं।

इसके बाद हम फ्रांस की राजधानी पेरिस पहुंचे। पेरिस वह जगह है जहां कला अपने विशाल रूप में मिलती है। हम आर्ट म्यूजियम में थे। एक विशाल महलनुमा इमारत, जिसके फर्श का ज्यादातर हिस्सा कीमती कालीनों से ढका हुआ था। लोग दुनिया की बेहतरीन कला में खोए थे… दरख्तों के साए, बादल के रंग। मूर्तियां जैसे बोल रही थीं। मुझे लगा ये सारी विशिष्ट कलाएं इंसानी वजूद हैं, जो सात सुर, सात रंग और न जाने कितने समय से देख रही हैं हमें। मोनालिसा की पेंटिंग पर हमारी नजर ठहर गई। जिस मुस्कराहट पर दुनिया जान देती है, उसका रहस्य क्या है, कौन जान पाया! हलकी-सी मुस्कराहट की सुर्खी, लबों पर तिरछी होकर मानो कुछ कह रही हो। दूध में जैसे गुलाबी रंग घुल गया हो। हम देखते रह गए।

दो दिन वहां रहने के बाद हम जर्मनी के लिए निकल पड़े। रास्ता हरे दरख्तों से घिरा था। इतना हरा शहर हमने अब तक नहीं देखा। आखें हरी हो गर्इं। बल खाते रास्तों के किनारे झील और उस पर मुकम्मल खामोशी। आसमान सुर्ख था… अब सूरज डूब रहा था। चंद लम्हों में यह सुर्खी रात में ढल गई। जर्मनी को अपने खूबसूरत होने का दर्प है तो वह अपने इतिहास पर शर्मिंदा भी है। हिटलर ने दुनिया के साथ जो कुछ किया, उस दाग को जर्मनी धोना चाहता है। इसलिए अगर किसी देश का कोई शरणार्थी जर्मनी पहुंच जाए तो वहां की सरकार उनकी जिम्मेदारी लेती है। हालांकि ऐश्वर्य में डूबे जर्मनी में भी गरीबी है। सड़कों के किनारे एक पूरा परिवार भीख मांगता नजर आया। यह पूंजीवाद का चेहरा है जो जर्मनी की भव्यता में छिप गया है। फ्रैंकफुर्त, जेनट्राम और ग्लैडबैक की खूबसूरती का रंग एक-सा है। यूरोप के ज्यादातर शहरों में गजब की एकरूपता है। हमारे देश की तरह विविधता नहीं है, इसलिए मन थोड़ी देर में ऊब जाता है।

जर्मनी की ऊंची नम हवाओं की गोद से निकल कर हम नीदरलैंड के नीले गहरे पानी में थे। शहर के बीचोंबीच नहर है, जो झील की तरह दिखती है। चारों तरफ बादामी जर्द, सुर्ख और सफेद रंग के फूल उगे हुए थे। सामने खूबसूरत इमारतों के मेहराब जैसे बादलों को छू रहे थे। हमने मोटरबोट ली और चल पड़े। मोटरबोट का चालक शहर के बारे में बता रहा था। उसकी आवाज गहरी थी, हम डूब रहे थे आवाज के साए में। वह कह रहा था… ‘सारी दुनिया, सारी कायनात रंगों के सिवा कुछ नहीं है’। मैं हैरान थी। मगर इतनी खूबसूरत दुनिया का एक स्याह रंग था वहां का रेडलाइट एरिया। बड़ी-बड़ी खिड़कियों के शीशे में निर्वस्त्र लड़कियां खड़ी थीं। राहगीर खिड़की के शीशे के पास रुकते और देह खरीदने का व्यापार खुलेआम चलता। देह के बाजार का इतना भयावह रूप मैंने नहीं देखा था। पूंजीवाद का चरम रूप, जहां सब कुछ बिकता है। पूरी दुनिया के खरीदार आते हैं। यह दूसरी ही दुनिया थी। मुझे सदमा लगा। कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। जैसे किसी ने ढेर सारी कालिख मेरे मुंह पर पोत दी हो। मुझे लगा वे महिलाएं कह रही हैं कि निकालो मुझे यहां से…! वे औरतें हवा में चिरागों की तरह उड़ रही हैं और दुनिया एक कब्रिस्तान में तब्दील हो गई है!

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