दीपक महान
राजस्थानी भाषा की एक सूक्ति के अनुसार मन की शांति के लिए ‘चुप रहवण में ही सार है’। अंगरेजी के विद्वान भी सलाह देते हैं कि चुप रहने पर अगर कोई आपको मूर्ख समझ भी ले तो यह उस क्षण से बेहतर है जब आपके बोलने से आपकी मूर्खता प्रदर्शित हो जाए। यानी मनुष्य को वाणी का प्रयोग बहुत संभल कर करना चाहिए, क्योंकि यही उसके व्यक्तित्व की पहचान बनती है। अन्याय के खिलाफ मौन रखने के अलावा चुप रहना कभी गलत नहीं होता। इसीलिए दार्शनिक अरस्तु ने मौन को मनुष्य की अमूल्य शक्ति कहा है। लेकिन लगता है इन ऐतिहासिक वेद-वाक्यों से भारत की कई विभूतियां अनभिज्ञ हैं। अगर ऐसा न होता तो ये प्रसिद्ध लोग सार्वजनिक मंचों पर वैसे अभद्र और गैरजिम्मेदार बयान न देते।
आमतौर पर मनुष्य ऊल-जलूल तब बोलता है जब वह अपना आपा खो देता है, उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है या वह किसी मनोवैज्ञानिक दबाव में होता है। पर आसाराम से लेकर मोहन भागवत या राज ठाकरे से लेकर मोंटेक सिंह अहलुवालिया और नरेंद्र मोदी तक न तो बेवकूफ हैं और न शोषित। इसीलिए समझ नहीं आता कि ये ऐसे ऊटपटांग वक्तव्य क्यों देते रहते हैं, जिनसे न केवल देशवासियों को कष्ट होता है, बल्कि देश की इज्जत भी धूमिल होती है। बात चाहे स्त्रियों के सम्मान की हो या महंगाई, भूख, भ्रष्टाचार या गरीबी की, हमारी इन विभूतियों की बातें सुन कर शक होता है कि इन लोगों के पास दिल है भी या नहीं, क्योंकि इनके वक्तव्य अक्सर संवेदनहीन और अमानवीय होते हैं।
ऐसी अभिव्यक्तियों के पीछे रूढ़िवादी सोच और निकृष्ट मानसिकता के साथ-साथ अहंकार और तिरस्कार का हाथ है। साथ ही, अपने फायदे के लिए ये आम जनता को भड़काने की कोशिश भी करते हैं। राजा-महाराजाओं की प्रथा भले खत्म हो गई हो, पर अभी भी भारतीय सोच में सामंतवाद और संकीर्णता कूट-कूट कर भरी है। जब मोहन भागवत बलात्कार के लिए शहरी समाज को दोष देते हैं तो वे भूल जाते हैं कि भंवरी देवी या फूलन देवी का शोषण ग्रामीण परिवेश में ही हुआ था। इसी तरह, आसाराम का दिल्ली बलात्कार कांड के लिए एक तरह से युवती को दोषी ठहराना उसी पुरुषोचित दंभ और बर्बरता का प्रस्फुटन है जिसके तहत औरत को भोग की वस्तु समझा जाता है और जिसके कारण दुशासन ने भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण किया था। राज ठाकरे जब बिहार के लोगों को महाराष्ट्र की विफलता के लिए कोसते हैं या तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के कुछ नेता महिलाओं को ही बलात्कार के लिए दोषी बताते हैं तो कहीं न कहीं ये अपनी कमजोरियों को छिपाते हैं। कमरतोड़ महंगाई के दौरान मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने जिस तरह ग्रामीणों के भरण-पोषण के लिए प्रतिदिन अट्ठाईस रुपयों की न्यूनतम मजदूरी को सही बताया, वह भी क्रूर मजाक था।
लेकिन इनसे अलग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कुछ बयान बहुत बचकाना लगते हैं। विदेशी भूमि पर जाकर अपने ही देशवासियों के सम्मान को ठेस पहुंचाना कहां की समझदारी है! मुझे लगता है कि ऐसी बातें अहंकार की उपज हैं, जिसके तहत उन्हें लगता है कि वे अतिविशिष्ट व्यक्ति हैं जिनके आने से भारतवासी धन्य हो गए, वरना शर्मिंदगी में ही जीते रहते। यह सोच बहुत खतरनाक है। अहंकार और खुद को अद्भुत समझ लेने की गलती से ही हर युग में लोकतांत्रिक नेता में से तानाशाह उभरते हैं। हिटलर ने भी जर्मन लोगों को करीब इसी भाषा में संबोधित कर खुद को उनके भविष्य का तारक कहा था।
लेकिन सच यह भी है कि आज के युग में बिना सोचे-समझे बोलना लोगों की आदत में शुमार हो गया है। ट्विटर, फेसबुक, वाट्स ऐप के कारण ज्यादातर लोग किसी गंभीर विषय पर भी तुच्छ निष्कर्ष दे देते हैं। कई बार तो इनसे समाज में गहरी गांठ पड़ जाती है और देश की आबोहवा खराब हो जाती है। इसलिए ऐसे कथन के वक्ताओं का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए। लेकिन हमारा समाज पार्टी, जाति, धर्म, ऊंच-नीच जैसे वर्गों में बुरी तरह बंटा हुआ है। लोग जब दोषी का मूल्यांकन अपराधी की तरह करने के बजाय उन्हें पार्टी, जाति, वर्ग और धार्मिक समूह के प्रतिनिधि के रूप में देख कर उनकी गलतियों को नजरअंदाज करते हैं तो वे समाज और राष्ट्र के साथ बेईमानी करते हैं। जब तक हम ऐसे लोगों का सामाजिक बहिष्कार नहीं करेंगे, तब तक ऐसी हरकतों पर लगाम नहीं लगेगी। पर क्या हमारी महिलाएं आसाराम या भागवत या जमायते-इस्लामी हिंद आदि के जलसों का बहिष्कार करेंगी? क्या लोग राज ठाकरे या ओवैसी जैसे राजनीतिकों की सभाओं में भीड़ बढ़ाना बंद करेंगे? सवाल का जवाब आसान है, लेकिन उस पर अमल करना हमारे समाज की ईमानदारी पर निर्भर है।
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