एक छोटे शहर से विस्थापित होकर इस महानगर दिल्ली में आ गया हूं। इन बहुमंजिला इमारतों के बीच एक फ्लैट में मेरी दुनिया सिमट कर रह गई है। दरवाजा बंद किया तो फिर आप अपनी छोटी या बड़ी दुनिया में बंद हो गए। हर मंजिल में सीढ़ियों के अगल-बगल चार गुफाएं हैं, जिनके दरवाजे कभी-कभार ही खुलते हैं। इन्हीं क्षणों में आपके सौभाग्य से किसी से ‘हाय-हेलो’ हो गई तो ठीक, वरना आप हैं और आपका टीवी या रेडियो है।
अब उस छोटे शहर के अपने मोहल्ले की जिंदगी याद आती है, जहां कतार में बने एक और दोमंजिला मकानों के बीच एक चौड़ा गलियारा था, जिससे होकर कभी सब्जी वाला, कभी मछली वाला और कभी कबाड़ वाला हांक लगाते हुए गुजरा करते थे। कभी कंधे पर चिकना लट्ठ लिए ‘बुढ़िया के बाल’ वाला बच्चों के आकर्षण का केंद्र बना होता था। इन घरों के दरवाजे सुबह खुलते तो रात को ही बंद होते थे। बच्चों को आजादी थी कि जब चाहें जिसके घर में घुस जाएं। लुका-छिपी खेल के दौरान या प्यास लगने पर वे गली के सिरे पर स्थित अपने घर न जाकर किसी भी चाची, ताई या दादी से बेहिचक पानी की फरमाइश करें।
फेरी वाले स्वर शब्दों की अस्पष्टता के बावजूद अपना आशय साफ कर देते थे। एक सिरे से आवाज उठती ‘कव्वा बाईस ड़ी’ तो दूसरे सिरे से ‘लो मछरी बाईस’। सब्जी वाला उन सभी सब्जियों के नाम आदतन दुहरा देता जो उसके ठेले में होतीं या नहीं भी होतीं- आलू लो, मूली लो, लौकी लो, प्याज लो, भांटा लो…!’ कभी-कभी कंधे पर हजामत बनाने के सामान का बटुआ लटकाए घुटनों तक धोती-कुर्ता पहने बुजुर्ग कुल्लू आ पहुंचते- ‘बाबूजी, अब तो बाल छांटे ढेर दिन हो गए हैं! अच्छे नहीं लग रहे हैं।’
ना-नू कहने के बावजूद कुल्लू घर के अंदर से कुर्सी लाकर मुझे कपड़े उतारने पर मजबूर कर देते। फिर मोहल्ले का गजट खुलता- बूढ़े चटर्जी साहब की बगिया से लड़कों द्वारा अमरूदों की चोरी और उनका खीझना, किसी मकान-मालिक की अपने किराएदार से लड़ाई से लेकर गली के नुक्कड़ वाले हलवाई द्वारा जलेबी का भाव बढ़ा देने की शिकायत तक। कुल्लू अपने पोते-पोतियों से छिपा कर रोज सुबह सौ ग्राम जलेबी का भोग लगा लेते। मैं उन्हें छेड़ता- ‘किसी दिन तुम्हारे पोते को ले जाकर तुम्हारा ठिया दिखा दूंगा।’ वे कहते- ‘अरे नहीं, सरकार ऐसा न करें…! बहू का मुंह फूल जाएगा।’
यहां मेरे पड़ोस में एक प्रतिभाशाली युवा कवि रहते हैं। अपने रचनाकर्म पर चर्चा करने में संकोच करते हैं। लेकिन हाल में एक दिन किसी प्रसंग में उन्होंने बताया कि उन्हें शाम को जोधपुर वाली ट्रेन पकड़नी है। एक संस्था ने काव्यपाठ के लिए आमंत्रित किया है। तीन-चार दिन बाद वे दिखे तो मैंने पूछा- ‘जोधपुर में कार्यक्रम कैसा रहा?’ कवि ने सूचित किया कि उस दिन ट्रैफिक जाम की वजह से उनकी गाड़ी छूट गई थी, वे जोधपुर जा ही नहीं पाए। हमारे पुराने मोहल्ले में भला यह अनर्थ होता कि हमारे पड़ोसी की ट्रेन छूट गई और हमें तीन दिन तक पता ही नहीं चला!
वहां तो मोहल्ले की संवादिया गुट्टन को उसी रात पता चल जाता और वे सुबह जल्दी उठ कर इंतजार करतीं कि जिसका भी दरवाजा खुले उसे सूचित कर दें कि रात चाचाजी की ट्रेन छूट गई और वे जोधपुर के आयोजन में नहीं जा सके। उसके बाद दूध वाला अपनी भैंस लेकर आता। कई महिलाएं हाथ में खाली बर्तन लिए वहां आ जुटतीं। दूधिया की हांक सुनते ही आने का कारण यह भी होता कि यह निगरानी रखी जा सके कि उसने थन धोने के बाद बाल्टी का पानी पूरी तरह गिरा दिया कि नहीं। गुट्टन को तब सार्वजनिक रूप से यह संवाद देने का मौका मिलता।
फिर महिलाओं में चर्चा चलती कि टिकट के पैसे वापस मिल पाएंगे कि नहीं। तभी धारीधार कच्छा और बनियान पहने एक पड़ोसी बुजुर्ग दातुन तोड़ने के बहाने वहां आ पहुंचते और महिलाओं की बहस की ओर कान लगा कर ध्यान से आज की चर्चा के विषय में अपना ज्ञान बढ़ाते। इन्होंने अपने जीवन में कभी मात्र छह माह के लिए रेलवे के किसी विभाग में नौकरी की थी। इस योग्यता के बूते वे खुद को रेलवे के कायदे-कानूनों का विशेषज्ञ समझते थे।
इस बीच भैंस वाला दूध दूह चुका होता। अब दूध बांटने का काम शुरू होता तो कुछ समझदार महिलाएं बुजुर्ग की बात ध्यान से सुनने के लिए कुछ पीछे सरक आतीं। उनका असली मकसद यह रहता कि ऊपर-ऊपर झाग वाला पौष्टिक दूध अन्य पड़ोसिनें ले लें, तब वे अपना बर्तन आगे करेंगी! अहा! क्या जिंदगी थी!
(शेखर जोशी)
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