कुछ दिनों पहले एक मित्र के यहां पार्टी में जाना हुआ। सभी लोग खाने-पीने और बातचीत में व्यस्त थे। इसी बीच तेज आवाज में एक भद्दा-सा फिल्मी गीत बजना शुरू हुआ। मैंने उस गाने के बोल समझने की कोशिश की। उस गीत में इस्तेमाल किए गए शब्द इतने फूहड़ थे कि मेरे लिए उन्हें सुनना मुश्किल हो रहा था। देखा तो बच्चों की टोली बड़े-बड़े साउंड बॉक्स के इर्द-गिर्द खड़ी थी और इसी तरह के गानों की फरमाइश कर रही थी। फिर शुरू हुआ डांस का दौर। सभी बड़ी मस्ती में थिरक रहे थे। बड़ों के साथ बच्चों को डांस करते देख उनकी माएं काफी खुश हो रही थीं। उन्हें बजने वाले गीतों से कोई परेशानी नहीं हो रही थी। लेकिन मुझे बेचैनी हो रही थी। कई बेहद अश्लील बोल वाले गीतों के शब्द दोहराना संभव नहीं है।
मगर हर जश्न को ऐसा मौका बनाने वाले समाज में यह किस कदर फैला होगा, मैं यह सिर्फ अंदाजा लगा रही थी। विडंबना यह कि इस तरह के गीत आजकल काफी लोकप्रिय हो रहे हैं। उन पर फिल्मांकन किसी भी सभ्य इंसान को शर्मसार कर देता है। अपने अनुभव से कहूं तो खासतौर पर महिलाओं के लिए बहुत असहज स्थिति हो जाती है। मुझे समझ में नहीं आता कि दिनोंदिन हमारे गीतों को क्या होता जा रहा है। क्यों इनकी गुणवत्ता में लगातार गिरावट आ रही है! जिन महिलाओं को इन्हें सुनना अजीब नहीं लगता, उनकी समझदारी और संवेदनशीलता पर मुझे शक होता है। कहा जाता है कि सिनेमा में वही दिखाया जाता है जो समाज में होता है। कुछ हद तक यह बात सही हो सकती है। सच यह है कि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, लेकिन संचार का एक सशक्त माध्यम होने के नाते सिनेमा अपने संदेशों के प्रसार की ज्यादा क्षमता रखता है।
तो सवाल है कि जनता के सामने कुछ लोग सिनेमा और फूहड़ गीतों रोलके माध्यम से किस तरह की मिसाल पेश कर रहे हैं या स्त्री-पुरुष संबंध और मानवीय रिश्तों को ताक पर रख कर कैसे मनोरंजन का दंभ भरा जा रहा है! ऐसा खुलेआम हो रहा है और इस तथ्य की अनदेखी हो रही है कि छोटे-छोटे बच्चों के मन में इस तरह के गानों का कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ऐसी खबरें आती रहती हैं कि किसी अपराधी ने किसी फिल्म को अपने अपराध के लिए प्रेरणा बताया। इसके बावजूद हम आंखें मूंदे बैठे हैं।
विरोधाभास यह है कि इस तरह की प्रवृत्ति के बढ़ने से बेफिक्र माता-पिता की यह भी चिंता रहती है कि उनके बच्चे किस तरह से संस्कारी बनें। लेकिन यह सब देखते-सुनते और उनमें शामिल होते बच्चे का मानस कैसा बनेगा? बेहद अश्लील और असभ्य भाषा को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाता बच्चा आगे चल कर महिलाओं के प्रति कैसा दृष्टिकोण रखेगा? यह बेवजह नहीं है कि मार-काट, लूट, बलात्कार, देह प्रदर्शन, भड़कीली पोशाक, मादक अदाओं के साथ मानवीय रिश्तों की धज्जियां उड़ाती फिल्में बॉक्स आॅफिस पर भारी कमाई करती हुई दिखती हैं। ‘आइटम सांग’ शब्द ही स्त्री को वस्तु के रूप में परोसता है। लेकिन इसके नाम पर भी आज फिल्मों की सफलता और विफलता तय हो रही है।
इसके अलावा, फिल्मों और धारावाहिकों में ‘एडल्ट कॉमेडी’ भी एक नए शब्द की शक्ल में बाजार में आया है। इसमें समूची फिल्म में पुरुष यौन-कुंठाओं को तुष्ट करने वाली जिस तरह की भाषा और दृश्य परोसे जाते हैं, वे आखिरकार समाज में महिलाओं की क्या हैसियत तय करते हैं? शब्दों के भ्रमजाल का आनंद उठाते वे वही पुरुष होते हैं, जो अपने घर की किसी लड़की या युवती के खुल कर हंसने या प्रेम करने पर उन्हें मार डालते हैं या ऐसा खयाल रखते हैं। ऐसी पटकथा वाली फिल्में कितनी आ रही हैं जिनमें सबको शामिल करते हुए एक सभ्य और स्वस्थ संदेश मौजूद हो।
कला के नाम पर सब कुछ की छूट देता सेंसर बोर्ड भी इस आरोप से मुक्त नहीं हो सकता। इसलिए सत्ता के एक केंद्र के रूप में अगर उसे बेहतर समाज के लिए कुछ करना जरूरी लगता है तो उसे ऐसे गीतों और फिल्मों के प्रति कड़ा रुख अपनाना चाहिए। गीत-संगीत वही अच्छे हो सकते हैं जो स्वस्थ मनोरंजन के साथ झूमने-गुनगुनाने और याद रखने पर मजबूर कर दें, न कि जिन्हें सुन कर नजरें नीची करनी पड़ें। लेकिन ऐसे नए इक्के-दुक्के गीत खोजे नहीं मिलते।
आज का सिनेमा और चारों तरफ बजते गीत-संगीत समाज का मानस तैयार करने का एक बड़ा औजार बन चुके हैं। अब इनके प्रभाव के मद्देनजर ही इनका समर्थन या विरोध किया जाना चाहिए। अभी तक किसी फिल्म का विरोध हुआ भी है तो बेमानी सवालों को लेकर, जिससे आमतौर पर फिल्मों के कारोबार को ही लाभ मिलता है। अगर भविष्य की पीढ़ियों और समाज को ध्यान में रखते हुए संगठित विरोध सामने आए तो कोई सार्थक नतीजा हासिल किया जा सकता है।

