राजेंद्र रवि
विद्यालय की शिक्षा पूरी करके मैं गया कॉलेज में प्रवेश लेकर भारतीय साम्यवादी दल की छात्र शाखा अखिल भारतीय छात्रसंघ में शामिल हो गया। बचपन से ही आसपास के जातिगत भेदभाव और आर्थिक गैर-बराबरी के खिलाफ मन में गहरा आक्रोश था। इसलिए समतावादी समाज के निर्माण की ललक लिए हम इस संगठन में सक्रिय हो गए। परिवार के लोगों को इस बात का अहसास भी नहीं था कि जिसके लिए वे एक-एक पैसा काट कर बड़े ओहदे की नौकरी का सपना संजोए थे वह किसी और काम में लगा है।
जल्दी ही दो वर्ष गुजर गए। अठारह मार्च उन्नीस सौ चौहत्तर को पटना में होने वाले विधानसभा के घेराव की तैयारी शुरू हुई। सभी छात्र संगठनों के साथ मिल कर चंदा जुटाने और ज्यादा से ज्यादा संख्या में विद्यार्थी पटना पहुंचें, इसके लिए अलग-अलग टोली में जिम्मेवारी बांटी जा रही थी। जेपी के नेतृत्व संभालने के बाद जहां आंदोलन का फैलाव हुआ, वहीं राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन के समर्थन और विरोध में खेमेबंदी शुरू हो गई। भारतीय साम्यवादी दल कांग्रेस के साथ चला गया। इन्होंने न सिर्फ आंदोलन का विरोध किया, बल्कि उसके खिलाफ पटना में ‘फासिस्ट विरोधी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन’ आयोजित किया।
हमने अपनी जिला समिति की मीटिंग में पूछा कि जिस आंदोलन में सारी जनता आ रही है, वह आंदोलन फासीवादी कैसे है? उन्होंने कहा कि यह अंतरराष्ट्रीय मामला है और पार्टी की यही लाइन है, हमें इसे मानना है। मैं पार्टी से बाहर आ गया। आंदोलन में सक्रिय रहा। आपातकाल आया। आपातकाल हटने पर चुनाव हुए। जनता पार्टी की सरकार बनी। लेकिन इसके समांतर और भी राजनीतिक घटनाएं हुर्इं। आंदोलन में शामिल संगठन अपने-अपने घोंसले में वापस चले गए।
जो कुछ कर गुजरने की तमन्ना से आए थे, उनमें से अधिकतर छात्र युवा संघर्ष वाहिनी में शामिल हो गए। इस संगठन ने देश में आमूलचूल परिवर्तन के लिए सघन क्षेत्रों का चुनाव करके काम शुरू किया। बोधगया भी इन क्षेत्रों में से एक था, जहां वाहिनी बोधगया महंत की जमींदारी के खिलाफ ‘भूमि मुक्ति आंदोलन’ चला रही थी। मैं भी वाहिनी में शामिल होकर सक्रिय हो गया। यह आंदोलन बोधगया महंत की गैर-कानूनी तरीके से रखी हजारों एकड़ जमीन को मुक्त करा कर भूमिहीनों के बीच वितरित करने के लिए था।
गया शहर में प्रतिदिन हजारों मजदूर जीविका की तलाश में आते थे। उनका एक हिस्सा रिक्शा चला कर अपनी जीविकोपार्जन करता था। वे शाम को गांव चले जाते थे। कई बार मैं किराए को लेकर सवारियों से उन्हें पिटते हुए देखता था। उस समय मैं सैद्धांतिक रूप से मानता था कि यह पेशा निहायत अमानवीय है, इसे समाप्त हो जाना चाहिए। हमने यह भी देखा कि रिक्शे से सफर करना कोई साधारण हैसियत की बात नहीं थी। कई बार तो लोग फख्र से कहते थे कि हम रिक्शा से आए हैं।
कुछ साल बाद दिल्ली आ गया। जिस इलाके में रहना शुरू किया, वहां रिक्शे बहुत चलते थे। प्रतिदिन आने-जाने से परिचय भी हो गया और सायास मैं परिचय बढ़ाता गया, क्योंकि हम आपसी संवाद के माध्यम से उन्हें इस अमानवीय व्यवसाय से मुक्ति का रास्ता दिखाना चाहते थे। धीरे-धीरे उनके समूह में उठना-बैठना हुआ। बातचीत के क्रम में मैंने फिर उनसे रिक्शे की अमानवीयता की बात छेड़ दी। उन्होंने कहा, ‘चलिए आज थोड़ा बैठ कर बात करते हैं।’ दोपहर का समय था। एक पार्क में इनका समूह बैठा था। उन्होंने कहा, ‘आप हर दिन मिलने पर यही कहते हैं कि रिक्शा अमानवीय है और इसमें बहुत शारीरिक बल लगता है।
आपको मालूम है कि बिना श्रम किए हमारा गुजारा नहीं हो सकता। हम गांव में खेतों में काम करते हैं, उसमें इससे कम बल नहीं लगता। लेकिन किसान सांस लेने की फुर्सत नहीं देता है। यहां किसी कारखाने में काम करते समय मालिक सिर पर सवार रहता है। काम और पैसा दोनों पर उसकी मर्जी चलती है। हमने सोचा, खून जलाना ही है तो क्यों न अपनी मर्जी से जलाएं। उसी दिन से हमने रिक्शा थाम लिया। अब इसमें हमारी मर्जी चलती है। मन किया तो चलाया, थक गए तो सुस्ता लिया, ज्यादा पैसे की जरूरत हुई ज्यादा काम किया; परिवार ने घर बुलाया, रिक्शा जमा किया और चल दिया।’
उन्होंने आगे बताया, ‘आप रोज आते-जाते हैं। कई बार आपके बुलाने पर भी हम जाने से मना कर देते हैं। ऐसा नहीं है कि आपके लिए मन में आदर नहीं है। लेकिन जब थके होते हैं तब आराम ही इसकी दवा है और यह ‘ना’ कहने का अधिकार हमें रिक्शा ही देता है। अगर आपको हम सबकी चिंता है तो रिक्शे की बेहतरी के लिए सोचिए, इसकी समाप्ति के लिए नहीं।’
मेरे पास उस दिन कोई जवाब नहीं था। लेकिन उसके बाद हमने आदर्श बदल लिया और रिक्शे के साथ खड़े हो गए।
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