विष्णु नागर
अब गरमी आ गई है। पहले जो था, अब बदल चुका है। ठंड में कपड़ों से लदे-फदे-दबे रहते थे, अब घर में बनियान-लुंगी पहनना काफी लगता है। आजकल नहाने-पीने के लिए ठंडा पानी चाहिए। ऊपर टंकी का पानी गरम हो तो नहाना मुश्किल हो जाता है। ठंड में नहाने-पीने के लिए ठंडे पानी का इस्तेमाल करना पड़ जाता था तो बहुत भारी लगता था। जो लोग तब बताते थे कि हम तो बारहों महीने ठंडे पानी से नहाते हैं, उनके चरण छू लेने को मन करता था! हालांकि इतना भी विनम्र नहीं हूं कि छू लेता! ऐसे सज्जनों को भरी गरमी में भी देखता हूं तो केवल यही याद आता है कि अच्छा, यही वह महान शख्सियत है जो ठंड में भी ठंडे पानी से नहाने का दम रखती है। इसलिए ये प्रणम्य हैं! हमारा यह हाल था ठंड में कि आज नहाएं या मुंह-हाथ धोकर ही काम चला लें, इसे लेकर काफी द्वंद्व की स्थिति बनी रहती थी। बाबा मार्क्स का द्वंद्वात्मकतावाद तभी याद आता था। बाथरूम में घुस कर भी तय नहीं कर पाते थे कि इधर जाएं या उधर जाएं। जब यह अहसास पक्का हो जाता था कि आज नहाने को टालना ठीक नहीं है तो उस दिन मन मार कर जल्दी-जल्दी नहा लेते थे। अब तो जितनी देर कहो, नहा लें।
आजकल दिन में कभी पैदल चलना पड़ जाए और रास्ते में कहीं पेड़ की छांव दिख जाए तो मन प्रसन्न हो जाता है। ठंड में तो धूप में ही चलने की भरसक कोशिश करते थे। एक दिन मजबूरी में भरी दोपहरी में मुहल्ले में निकलना पड़ गया तो अपने क्षेत्र में हरे-भरे पेड़ों की बहुतायत देख कर मन बहुत प्रसन्न हुआ और ज्यादातर समय छाया में चल सका। ठंड के दिन थे तो धूप बहुत प्यारी लगती थी। मेरा बस चलता तो सुबह से शाम तक धूप में ही बैठा रहता। ठंड में अपने सामने की इमारत के फ्लैट में रहने वालों पर रश्क हुआ करता था कि उनकी बालकनी में कितनी जल्दी धूप आ जाती है। मगर अब याद भी नहीं आता कि ठंड में ऐसा होता था। ठंड में धूप अक्सर धोखा दे जाती थी, जल्दी से बादल छा जाते थे। मगर अब मजाल है कि ऐसा कभी हो! मान लिया जाए कि कुछ समय बाद अगर आसमान में बादल छा जाएंगे तो जिसे मन मयूर नाच उठना कहते हैं, वैसी स्थिति हो जाएगी। मैं बरसात की चर्चा यहां जानबूझ कर नहीं कर रहा, क्योंकि दिल्ली में बरसात का कोई भरोसा नहीं कि आएगी या नहीं और आएगी तो कितनी आएगी। हालांकि कभी-कभी वह तमाम हदें तोड़ भी देती है।
यही शायद जिंदगी का खेल भी है। जब जिसके होते हुए भी जिसके होने का अहसास तक नहीं होता, तब वह चीज हमारे पास खूब होती है और लगता है कि यह कभी खो जाने वाली, बीत या खत्म हो जाने वाली चीज नहीं है। मगर जब उस सुख को पाने की ललक तीव्र हो जाती है, जब उसका मूल्य समझ में आना शुरू हो जाता है। तब कई बार वह नहीं मिलती। हमारे देश में एक बहुत बड़ा गरीब तबका है, जिससे जूझने वाले लोग जब तक जवान रहते हैं, तो उनका भी खूब खाने-पहनने का मन होता है। खूब घूमने, सिनेमा देखने, मौज मनाने का मन होता है। मगर आर्थिक अभाव इस कदर घेरे रहते हैं कि घर के सब लोगों को रोटी मिल जाए, इसी में खैर मनाते हैं। अगर उनमें से कुछ लोग जब तक किसी तरह अभाव की उस स्थिति से बाहर निकल पाते हैं, तब तक उनका शरीर इतना थक और बीमारियों से जर्जर हो चुका होता है कि खाने-पीने और घूमने की सुविधा होते हुए भी उसका आनंद लेने का समय जा चुका होता है।
अभावों में जीना एक आदत, एक अभ्यास बन चुका होता है। पैसा होते हुए भी खर्च करने की हिम्मत नहीं होती। अपने ऊपर ही नहीं, दूसरों की भलाई के लिए भी खर्च करने का जज्बा सूख चुका होता है। पैसा अपने पास होना और जितना ज्यादा आए, उतना अच्छा लगता है। पैसा सबसे बड़ा और सबसे विश्वसनीय सुरक्षा कवच है, ऐसा लगने लगता है, जबकि वक्त आने पर वह भी काम नहीं आता। कई बार काम आने के बजाय वह समस्या की जड़ बन जाता है, बुढ़ापे के दुखों का बीमारियों से भी ज्यादा बड़ा कारण बन जाता है। वह अकेला करता चला जाता है। मौसम बदलने के साथ तो खुद को हर साल बदलना आसान होता है, मगर अपने अतीत की जड़ता से लड़ना, उससे बुरे सबक न सीखना मुश्किल होता है।
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