प्रवीण कुमार सिंह

दिल्ली से जब मैंने पश्चिम एक्सप्रेस से गुजरात का रुख किया तो मन में बहुत कौतूहल था। गुजरात के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था, इसलिए यह स्वाभाविक भी था। एक पक्ष के लोग गुजरात को देश का सबसे विकसित राज्य बताते हैं, दूसरे पक्ष वाले इसके विपरीत। दिमाग में यही चल रहा था कि सच तो देखने पर ही पता चलेगा। दरअसल, पिछले दिनों वडोदरा में आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल होने का न्योता मिला था। मैंने सोचा इसी बहाने गुजरात को कुछ देखना-जानना भी हो जाएगा। यों भी, मेरे पसंदीदा हीरो अमिताभ बच्चन टीवी पर बुलाते रहे हैं कि ‘आओ कुछ दिन गुजारो, अपने गुजरात में’! खैर, वडोदरा पहुंचा, जो दर्शनीय था, वह देखा। वडोदरा के पास ही आणंद जिला है। यहीं कूरियन ने ‘अमूल’ की शुरुआत की थी। आणंद में मेरे जानने वाले एक शिक्षक थे। मैं वहीं चला गया। हालांकि समाज और राजनीति के अध्ययन के लिहाज से वहां कुछ खास नहीं था मेरे लिए।

बहरहाल, एक दिन इंटरनेट की जरूरत पड़ी तो शहर के एक साइबर कैफे में गया। कैफे का संचालक तकरीबन बीस साल का एक लड़का था। उसने इंटरनेट का इस्तेमाल करने के पहले मुझसे पहचान पत्र की मांग की। मैंने पैन कार्ड उसे दिया। उसने कहा कि पैन कार्ड नहीं चलेगा। मैंने इसकी वजह पूछी तो उसने बताया कि इसमें आपका पता नहीं है। मेरे लिए समस्या हो गई, क्योंकि उस वक्त दूसरा कोई पहचान पत्र पास नहीं था। मैंने उससे कहा कि ट्रेन में पैन कार्ड को पहचान पत्र के रूप में स्वीकार किया जाता है तो तुम्हें क्या दिक्कत है। लड़के ने कहा कि यह यहां का नियम है और पुलिस का आदेश है। इसके बाद उसने पुलिस से फोन पर बात करने की सलाह दी। मैंने अपने मोबाइल से सौ नंबर पर फोन किया। घंटी बजती रही, लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया।

कैफे में आए एक दूसरे व्यक्ति ने मुझे पुलिस स्टेशन का नंबर दिया। मैंने वहां फोन किया और अपनी समस्या बताई। पुलिसकर्मी ने बताया कि यह कलक्टर का आदेश है। मैंने गुजारिश की कि मेरा नाम-पता लिख लीजिए, जो चाहे पूछताछ कर लीजिए। मैं अगर कोई संदिग्ध होता तो क्या आपको फोन करता! इसके बाद उसने मुझे पुलिसिया भाषा में फटकार लगाई और कहा कि कैफे वाले से बात कराओ। मुझे लगा कि शायद मेरा काम हो गया। लेकिन पुलिसकर्मी ने कैफे संचालक से गुस्से से भरे लहजे में कहा कि तुम्हें जो भी करना है, अपने जोखिम पर करो। बाद में जो झेलना होगा, उसके लिए मुझे फिर फोन मत करना।

मेरे लिए बड़ी समस्या हो गई। मैंने संचालक लड़के से अनुनय-विनय की। उसने कहा कि मैं यहां नौकरी करता हूं। पुलिस वाले हमेशा जांच करने आते हैं। किसी बहुत छोटे से बहाने से भी पुलिस स्टेशन लेकर चले जाते हैं। वहां पांच-छह घंटे बिठा कर रखते हैं। काफी मानसिक प्रताड़ना और परेशानी झेलनी पड़ती है। इस बीच करीब आधा घंटा गुजर गया। मैंने नरम लहजे में उससे कहा कि तुम्हीं कोई उपाय बताओ। मेरी परेशानी देख कर उसने पूछा कि क्या आपके इ-मेल में कोई पता वाले पहचान-पत्र की कॉपी है। मुझे याद आया और मैंने ‘हां’ कहा। उसके बाद उसने मुझे मेरे इ-मेल का पासवर्ड मांगा। बताने के सिवा मेरे पास कोई दूसरा चारा नहीं था। फिर मेरा इ-मेल उसने खोला और मेरे पहचान-पत्र का प्रिंट निकाला और आखिर मुझे इंटरनेट के उपयोग की इजाजत दी। मैंने उसे धन्यवाद दिया।

खैर, उससे और भी बात होने लगी। उसने बताया कि वह इंजीनियरिंग का छात्र है और यहां वक्त निकाल कर तीन घंटे सुबह और चार घंटे शाम की नौकरी करता है। मैंने उसका हौसला बढ़ाया और उसकी तनख्वाह पूछी। उसने बताया महीने के दो हजार रुपए। मैंने सुना था कि ‘वाइब्रेंट गुजरात’ यानी विकास की सीढ़ियां फलांगने का दावा करते गुजरात में न्यूनतम मजदूरी छह हजार छह सौ रुपए हैं। मैंने जब उससे कहा कि दो हजार रुपए तो बहुत कम हैं तो उसने अपनी लाचारी बताई- ‘क्या करें हम! हमारी मजबूरी है। इससे ज्यादा कहीं भी नहीं मिलता।’ मैंने उसे गुजरात के प्रचारित विकास की बात की। उसने दुखी मन से कहा- ‘विकास क्या है, यह हमें मालूम नहीं!’

इसके बाद मैं वडोदरा और आणंद के अलावा गुजरात के गोधरा, अमदाबाद, सूरत और कुछ अन्य इलाकों में गया। मैंने बहुत सारे लोगों से ‘विकसित गुजरात’ के बारे में पूछा। सबने मुझे यही बताया कि उन्हें नहीं पता है कि विकास किसे कहते हैं और वह कहां है!

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