राजकिशोर
मानव जीवन में जितनी घटनाएं होती हैं, उनमें छूटना सबसे ज्यादा पीड़ादायक है। धार्मिक लोग बताते हैं कि एक दिन सभी कुछ छूटना है। मृत्यु इसलिए दुख भरी होती है कि आदमी अपने सामने सब कुछ छूटते हुए देखता है- उसका परिवार, दोस्त, संपत्ति और सबसे बड़ी चीज : जिंदगी। यह आखिरी बस या ट्रेन छूटने की तरह है, जिसके बाद कोई बस या ट्रेन नहीं आनी है। अनंत से आया हुआ जीव अनंत में विलीन हो जाता है।
जीवन और मृत्यु में कुछ गुण समान होते हैं, क्योंकि मृत्यु जीवन की ही परिणति है। मृत्यु के बाद सब कुछ छूट जाता है, तो जीवन में भी बहुत कुछ छूटता जाता है। शहर छूट जाता है, काम करने की जगह छूट जाती है, दोस्त छूट जाते हैं, प्रेम छूट जाता है, पार्टी छूट जाती है, संकल्प छूट जाते हैं, भविष्य तक छूट जाता है। इस विचित्र दुनिया में पाने के लिए बहुत कुछ है तो छूट जाने के लिए भी बहुत कुछ है। कुछ मामलों में दोनों एक-दूसरे के पर्याय हैं। कोई शहर तभी छूटता है जब कोई नया शहर मिल जाता है। जब मुझे दिल्ली मिली, तब कोलकाता (कलकत्ता) छूट गया।
फ्रायड ने पूछा है कि जब कोई विचार मर जाता है, तब वह कहां चला जाता है? वाजिब सवाल है, क्योंकि प्रकृति में कुछ नहीं मरता- वह बस रूप बदल लेता है। सोना मिट्टी हो जाता है, मिट्टी सोना हो जाता है। जीवन भी कुछ ऐसा ही है। फ्रायड कहते हैं, जो विचार मर जाते हैं, वे वास्तव में हमारे अचेतन के अंध महासागर में समा जाते हैं और मौका पड़ने पर दुर्धर्ष रूप में सामने आते हैं। तब आदमी अपने सामने ही असहाय हो जाता है।
दिल्ली ने मुझे बहुत कुछ दिया, पर वह उसके सामने कुछ नहीं है जो कोलकाता ने दिया था। ऐसा नहीं है कि लगता नहीं है दिल मेरा उजड़े दयार में। दिल्ली अभी भी आकर्षित करती है, क्योंकि यहां बहुत कुछ है जो मेरे लिए आवश्यक है। पर कोलकाता मेरी आध्यात्मिक आवश्यकता है। वहां जाकर मैं फिर से हरा हो जाता हूं। दिल्ली की बहुत-सी चीजों को मैं याद करना नहीं चाहता, पर कोलकाता की हर चीज याद रहती है। कोलकाता मुझसे छूट गया है, पर वह वास्तव में छूट नहीं गया है। कुछ चीजें अचेतन में चली गई होंगी, पर ढेर सारी चीजें चेतना के स्तर पर नृत्य करती रहती हैं। मैं भौतिक रूप से दिल्ली में मरूंगा, पर मन के स्तर पर अपने कोलकाता में मरूंगा। इससे बेहतर क्या हो सकता है कि आदमी जहां पैदा हो, वहीं मरे।
जो छूट जाता है, वह हमारे लिए छूट जाता है, पर उनके लिए नहीं जो छूट गए। इसका सबसे बड़ा साहित्यिक साक्ष्य है कविवर सूरदास का भ्रमर गीत। विरह की ऐसी अभिव्यक्ति दुनिया के किसी भी साहित्य में नहीं मिलती। कृष्ण ने वृंदावन छोड़ा और द्वारका जा बसे, तब उनके लिए वृंदावन मिट-सा गया, पर वृंदावन में रहने वालों के लिए वे रोज के अखबार जैसा बने रहे। पुरुष अपना दुख जब्त कर लेते हैं, पर स्त्रियां बिलखती रहती हैं।
राधा और कृष्ण की अन्य संगिनियों का दुख तब फूट पड़ता है जब कृष्ण के दूत के रूप में उद्भव उन्हें ज्ञान देने के लिए वृंदावन आते हैं। वे कृष्ण की भौतिक काया को छोड़ कर ईश की आराधना करने को कहते हैं, तो गोपिकाएं पलटवार करती हैं- ‘ऊधो, मन नाहीं दस-बीस। एक हुतो सो गयो स्याम संग, को आराधे ईस।’ सचमुच, मन में इतनी जगह नहीं होती कि सबको एक साथ रख लिया जाए- इतनी जगह कहां है दिले-दागदार में। एक हटेगा तभी दूसरा आएगा। गोपियों के लिए कृष्ण को छोड़ कर कोई पुरुष नहीं रह गया था। यह एक ऐसा सामूहिक प्रेम था, जिसका कोई और उदाहरण नहीं है। इसलिए कृष्ण महान थे, तो उनकी गोपियां भी कम महान नहीं थीं। हां, एक साथ दो कृष्णों की उपासना जरूर की जा सकती है, जैसे कृष्ण किसी एक गोपिका से बंधे हुए नहीं थे।
लेकिन राधा को या गोपियों को अगर कोई अन्य पुरुष मिल भी जाता, तब क्या कृष्ण उनकी जिंदगी से बाहर चले जाते? वे अचेतन में डूब नहीं मरते, बल्कि चेतना के हर स्तर पर बने रहते। इसीलिए बर्नार्ड शॉ कहते हैं कि जो व्यक्ति स्त्री के पूर्व-प्रेमों के बारे में जानना चाहता है, वह उसके अतीत पर भी कब्जा करना चाहता है। कभी-कभी आदमी दूसरों को अपने अतीत में शामिल करना चाहता है, पर यह अकेलेपन से मुक्ति पाने का एक जरिया है। कथाकार और कवि अपने निजी अनुभवों को अपनी रचनाओं से व्यक्त करते हैं, यह भी ऐसा ही एक रास्ता है। सामान्य आदमी के स्मरण में यथार्थ होता है- लेखक उसके साथ स्वप्न को आटे की तरह इस तरह गूंथता है कि एक नई सृष्टि बन जाती है।
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