अजीब-सी बात है। समाज हो या साहित्य, कहीं भी किसी से असहमत होना दिक्कतदेह हो सकता है। असहमत होने का मतलब है कि हुक्का-पानी बंद। असहमति को इतनी बुरी निगाह से देखा जाने लगा है कि संवाद की हर गुंजाइश खत्म-सी होती जा रही है। समाज और साहित्य के लोगों से सहमत होकर बस उनकी तारीफों के पुल बांधते रहिए, पर उनके खिलाफ जरा-भी असहमति प्रकट मत होने दीजिए, क्योंकि क्या पता कब, कौन, कहां, किस बात का बुरा मान जाए! किसी की असहमति को लोग अब अपना ‘चरित्र हनन’ जैसा समझने लगे हैं।
भला यह कैसे संभव है कि इतने विशाल समाज और वैचारिक साहित्य के बीच कहीं कोई असहमति का स्वर न उठे। समाज में हर तरह के लोग मौजूद हैं। सबकी अपनी अलग-अलग विचारधाराएं हैं। इनमें से कुछ का स्वभाव हर बात पर सहमति का रहता है, तो कुछ का असहमति का। पर सच यह है कि सहमति को सुनना-समझना-जानना उतना ही जरूरी है, जितना कि असहमति को। लोगों के बीच जब तक असहमति को सुनने का धैर्य नहीं होगा, सामाजिकता भला कैसे बची रहेगी! कैसे हम यह यकीन कर पाएंगे कि केवल सामने वाला सही है, बाकी सब गलत। गलत को गलत साबित करने के लिए असहमति का होना जरूरी है।
साहित्य को हम विचार की दुनिया कहते-मानते आए हैं। साहित्य में विचार की प्रासंगिकता सहमति और असहमति के बल पर ही टिकी है। अब अगर साहित्य में भी असहमति को गैर-वाजिब समझा जाएगा, तो फिर संवाद की संभावना समाप्त हो जाएगी। साहित्य विचार के साथ-साथ सहमति-असहमति की भी समान छूट देता है।
सहमति-असहमति को साधने में संवाद महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन जिस तरह साहित्यिक लोगों के बीच संवाद का रिश्ता सीमित होता जा रहा है, वह बेहद दुखद स्थिति है। सहमति के साहित्य को तो सब अपनाना चाहते हैं, लेकिन असहमति के साहित्य को कोई अपनाना नहीं चाहता। साहित्य और विचार पर असहमति प्रकट करने वालों से संबंध यों खत्म कर लिए जाते हैं, मानो हम आपके हैं कौन!
आखिर यह कैसे संभव है कि साहित्य में जो कुछ लिखा या कहा जा रहा है, सब ठीक ही है। सब पर सहमति बना कर ही चलना चाहिए। अगर सब ठीक है तो फिर संवाद की जगह और असहमति की गुंजाइश ही कहां बचती है। फिर तो सहमति और बे-खतरे का साहित्य रचते रहिए, तारीफ करते और सुनते रहिए। मगर ऐसा करके क्या हम साहित्य के बीच बने रहने वाले संवाद और असहमति के रिश्ते को कायम रख पाएंगे?
मैं जानता हूं कि असहमति के अपनी तरह के खतरे हैं। इन खतरों को मोल लेना हर किसी के बूते की बात नहीं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम असहमति से कन्नी काटने लग जाएं, एक बेहतर संवाद के माध्यम को ही बेअसर कर दें। यह सही है कि अक्सर असहमति के स्वर थोड़े ऊंचे अवश्य हो जाते हैं, लेकिन इससे क्या! इस बहाने अनदेखी करने वाले लोगों के कानों को कम से कम सुनाई तो दे जाता है! सहमति के साथ-साथ असहमति की हकीकत को तो वे जान-समझ पाते हैं। यों, देखा जाए तो असहमति का अपना मजा है। पर इस मजे का लाभ खुशमिजाज लोग ही उठा पाते हैं। अपने खिलाफ चलने वाले असहमतियों के तीर से डर कर भागना कायरता का प्रतीक है। कम से कम साहित्यकार-लेखक को तो इसे समझना चाहिए!
आमतौर पर बहुत कुछ ऐसा पढ़ने को मिलता रहता है, जहां असहमति की संभावना बन जाती है। गाहे-बगाहे अपनी असहमतियों को जताता भी रहता हूं। लेकिन ज्यादातर मामलों में मैंने महसूस किया है कि असहमति पर असहजता बहुत जल्दी हावी हो जाती है। असहमति के प्रकाश में आते ही संबंधों पर अंधकार के बादल गहराते चले जाते हैं। माना कि वे बहुत बड़े लेखक, साहित्यकार या फिर समाजशास्त्री हैं, लेकिन असहमति का जिक्र आते ही सारा का सारा बड़प्पन धूल में मिल जाता है। संवाद खत्म हो जाता है। प्रगतिशीलता धरी की धरी रह जाती है। फिर न विचार का कोई महत्त्व रह जाता है न वैचारिकता का।
बहरहाल, बात जो हो, मगर असहमति की गुंजाइश तो बनी ही रहनी चाहिए। समाज और साहित्य के बीच अगर असहमति की गुंजाइश बनी रहेगी तो धैर्य और विचार का रिश्ता भी आपस में जुड़ा रहेगा। इसलिए बेहतर संवाद को बनाए रखने के लिए असहमतियां भी जरूरी हैं।
अंशुमाली रस्तोगी
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