बीते दिनों राजधानी में दो शाही शादियों की दावत दी गई। पहली क्रिकेट खिलाड़ी हरभजन सिंह की अपनी मित्र गीता के साथ शादी की और दूसरे विवाह समारोह में शाही इमाम के साहबजादे के निकाह के बाद राजधानी की तारीखी जामा मस्जिद में दावते-वलीमा की भव्य दावत दी गई। उस दिन जामा मस्जिद को किसी दुल्हन की तरह सजाया गया था। दोनों पार्टियों में देश की शीर्ष राजनीतिक हस्तियां और नामवर शख्सियतें पहुंचीं। हरभजन सिंह देश के लाखों क्रिकेट प्रेमियों के चहेते हैं। इसी तरह इमाम बुखारी एक बड़े धार्मिक नेता हैं। क्या ऐसे मशहूर लोगों को शोभा देता है कि वे शादी जैसे समारोहों में अपने पास अकूत धन का दिखावा करें! क्या खास इंसान या जानी-मानी हस्ती अपनी गतिविधियों से सादगी का संदेश नहीं दे सकतीं? आखिर हम अपने कई बड़े नेताओं की सादगी से भरी जीवन-शैली से खुश होते ही रहे हैं कि ऐसा करके वे दिखावे और फिजूलखर्ची से दूर रहने का संदेश देते हैं!

कोई व्यक्ति जिंदगी के किसी क्षेत्र में सफल होकर ज्यादा धन कमाए, इसमें किसी को क्या एतराज होगा! लेकिन इस तरह पैसे की बर्बादी और अथाह धन के प्रदर्शन को कैसे वाजिब ठहराया जा सकता है! जबकि हमारे समाज में ही इस तरह के अनेक खास माने जाने वाले लोग मौजूद हैं जो सादगी को महत्त्व देते हैं। कुछ साल पहले भारतीय क्रिकेट के मशहूर खिलाड़ी महेंद्र सिंह धोनी ने बेहद सादगी से विवाह किया। इसी तरह हाल में महिंद्रा एंड महिंद्रा समूह के अध्यक्ष आनंद महिंद्रा की पुत्री आलिका महिंद्रा ने एक अनाम युवक गोर्ग से अमेरिका में शादी की जो पेशे से वास्तुकार है। आलिका का विवाह न्यूयार्क में बेहद सादे अंदाज में हुआ। उसमें कोई तड़क-भड़क नहीं थी। इसी तरह, देश की चोटी की आइटी सेक्टर की कंपनी विप्रो के चेयरमैन अजीम प्रेमजी के पुत्र राशिद की शादी की खुशी में सिर्फ एक ‘हाई टी’ का आयोजन किया गया। बाकी सारा विवाह बेहद सादगी और गरिमापूर्ण तरीके से संपन्न हुआ।

मेरे मन में अक्सर यह सवाल आता है कि आखिर हमारे देश में खास से लेकर आम घर-परिवारों में शादियों या दूसरे समारोहों में इतने पैसे की बर्बादी क्यों होती है। मध्यवर्गीय परिवारों की शादियों में भी पच्चीस-तीस लाख रुपए एक पक्ष के खर्च हो जाते हैं। कायदे से देखा जाए तो सामाजिक-धार्मिक-राजनीतिक नेताओं को अपनी ओर से शादियों या ऐसे निजी समारोहों में होने वाली फिजूलखर्जी पर रोक के लिए आगे आना चाहिए। लेकिन इसके उलट ही चीजें देखने में आ रही हैं।

बेशक, विवाह समारोह के खिलाफ कोई भी नहीं होगा। पर इसके खर्च में दिखावे का समर्थन करना मुश्किल है। जिनके पास अकूत धन है, उनके लिए कोई परेशानी नहीं होती। लेकिन इसी तरह के दिखावे का प्रदर्शन कम पैसे वालों के भीतर भी एक स्वाभाविक भूख पैदा करता है। इसके बाद होता यही है कि आमतौर पर कम आमदनी वाले लोग भी शादी या पारिवारिक समारोहों में कर्ज लेकर खुशी के नाम पर खर्च करते हैं। इस तरह प्रदर्शन की भूख में लोग कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं। यह कहां की समझदारी है? एक ओर, शादियों में फिजूलखर्जी लगातार बढ़ती जा रही है, वहीं दहेज प्रथा कमजोर होने के बजाय और मजबूत होती जा रही है। लोग ज्यादा से ज्यादा दहेज लेने और देने के लिए उतावले हो रहे हैं। जिन समुदायों में दहेज का चलन बिल्कुल नहीं था, वहां भी आज दहेज ने घुसपैठ कर ली है।

हालांकि बीच-बीच में कुछ इस तरह की खबरें आती रहती हैं कि किसी युवती ने उस बरात को अपने दरवाजे से लौटा दिया जिसमें वर पक्ष के लोग ज्यादा दहेज की मांग पर अड़े हुए थे। लेकिन कुल मिला कर हालात कोई बहुत बेहतर नहीं हैं। सन 1961 में ही दहेज लेने और देने, दोनों को कानूनन अपराध घोषित किया गया। मगर आज भी एक लड़की के परिवार से दहेज की मांग एक तरह से जबर्दस्ती की जाती है, वरना शादी की बात खत्म होने की नौबत आ जाती है। कुछ लड़के खुद ही मांग सामने रख देते हैं। जबकि कुछ साल पहले तक लग रहा था कि अब दहेज लेने-देने का चलन खत्म हो जाएगा। लेकिन अब तो छोटे शहरों या कस्बों तक में विवाह समारोहों के पंडालों के बाहर कई बार नई चमचमाती कार खड़ी कर दी जाती है। यह वधू पक्ष की ओर से वर को देने के लिए होती है। इसके पीछे दिखावे की मानसिकता के सिवा और क्या हो सकता है! सच यह है कि उपभोक्तावाद की चकाचौंध में किसी भी रास्ते विलासिता की चीजें हासिल करने की ललक ने युवकों को लालची बना दिया है। अफसोस कि नए दौर के नौजवान भी दहेज लेने-देने में कोई शर्म महसूस नहीं करते।