आजकल की युवा पीढ़ी पढ़ने-लिखने में पिछड़ रही है, यानी भारत एक बेहतर राष्ट्र होने से पिछड़ रहा है। इंटरनेट और तकनीकी शिक्षा के प्रति विद्यार्थियों के बीच जो गहरा लगाव उपजा है, उससे साहित्य और मानविकी जैसे विषयों को पढ़ने-पढ़ाने की परंपरा को हानि पहुंच रही है। दूसरी ओर, शिक्षक के दृष्टिकोण से शिक्षा राष्ट्र निर्माण के वृहद् सरोकार से कट कर एक पेशा मात्र रह गई है। सस्ते को साधारण और दोयम दर्जे का मानना और महंगे मोबाइल, महंगी पोशाक, महंगी शिक्षा को वरीयता देना नई पीढ़ी के बीच शगल की तरह है।
किसी व्यक्ति या परिवार का जीवन-स्तर ऊंचा हो सकता है, मगर सिर्फ किसी को छोटा दिखाने और खुद को बड़ा साबित करने के लिए दिखावा करना कहां तक सही है! साहित्य और मानविकी के विषयों के तहत दी जाने वाली शिक्षा मनुष्य को नैतिक और अच्छा मनुष्य बनने में काम आती है। जाहिर है, विज्ञान और गणित जैसे विषय यह काम नहीं कर सकते हैं। मगर फिर भी जो महत्त्व विज्ञान और गणित को मिलता है, वही हिंदी जैसे विषय को नहीं मिलता है।
परिवार अगर समाज की प्रथम इकाई है तो इस दृष्टि से अभिभावक प्रथम शिक्षक हुआ। इसलिए उसकी भूमिका इकहरी नहीं होनी चाहिए, मगर अभिभावक घर पर अपने बच्चे पर अंग्रेजी पढ़ने और बोलने का दबाव बनाते हैं और शिक्षक कक्षा में सिद्धांत या किताबी ज्ञान बघार कर विद्यार्थी की सोच को कुंठित करता है। फिर भी कुछेक छात्र हिंदी इसलिए पढ़ना चाहते हैं कि वह अन्य विषयों की तुलना में आसान है और उनकी समझ में उसमें अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। लेकिन हिंदी की यह सरलता जो विद्यार्थी समूह को आकर्षित करती है, उसे साधना दुष्कर और श्रमसाध्य हो सकता है। समस्या ज्ञान और विवेक अर्जित करने की नहीं, बल्कि अंकों की है। विज्ञान और गणित में विद्यार्थी हिंदी जैसे विषय की अपेक्षा अधिक अंक पा जाते हैं जिससे उनका अंक प्रतिशत गिरता नहीं है, इसलिए विद्यार्थी के नजरिए से हिंदी पढ़ना घाटे का सौदा ही साबित होता है।
हिंदी की प्राध्यापिका होने के नाते ऐसे अनुभव मुझे होते रहते हैं। जो विद्यार्थी बिना किसी पूर्वग्रह और समय के दबाव को झेल कर भी हिंदी पढ़ना चाहते हैं, उनकी वजह से स्थिति अब भी थोड़ी संभली हुई है। सन 2013 में रामजस कॉलेज में बीकॉम के विद्यार्थियों को पढ़ाते हुए मुझे इस तरह का सुखद अनुभव हुआ। ंिहंदी में इस छात्र-समूह की दिलचस्पी और हिंदी सीखने की उनकी ललक ने मुझे बेहद प्रभावित किया। हालांकि वे मूल रूप से हिंदी के विद्यार्थी नहीं थे, फिर भी कक्षा में उनकी उत्साहजनक उपस्थिति प्रशंसनीय थी। विद्यार्थी से मित्रता और अपनत्व शिक्षक के लिए एक महत्त्वपूर्ण अस्त्र साबित होता है, इसका अंदाजा मुझे तब लगा था।
लेकिन आज शिक्षक और विद्यार्थी का रिश्ता स्वार्थ के कुचक्र में धंसता जा रहा है। यही कारण है कि शिक्षा सिर्फ व्यवसाय बन कर रह गई है और अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक गई है। अभिभावक, शिक्षक और विद्यार्थी तीनों ही अपनी-अपनी भूमिकाओं को निभाने में अक्षम हैं। सृजनशीलता और रचनात्मकता को महत्त्व देने के बजाय हम केवल यंत्र के दास हो रहे हैं। सत्य, अहिंसा और स्वाभिमान जैसे शब्द अब केवल किताबी ज्ञान बन कर रह गए हैं, जिसका मर्म कोई नहीं समझता।
जो हो, हिंदी वह भाषा है जिसमें इन तमाम सद्गुणों का विकास हुआ है। इसमें हमारी परंपरा और अनुभव दोनों एक साथ जीवंत होकर बोलते हैं। ‘कोस-कोस पर पानी बदले, पांच कोस पर बानी’ वाले राष्ट्र की विविधता को एकता में पिरोने की जो परंपरा है, उसकी रक्षा का दायित्व हिंदी के कंधों पर है। भारत में बाईस राजभाषाएं हैं। इसके बावजूद हरेक हिंदुस्तानी का दिल थोड़ा बहुत हिंदी के लिए धड़कता ही है। इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि स्वतंत्रता आंदोलन में सबने एकजुट होकर हिंदी के माध्यम से एक दूसरे का सहयोग किया। अंग्रेजों ने अपनी शिक्षा-नीति में जिस अंगे्रजी को काबिज किया, वह आज भी देश को बांट रही है।
अमीर-गरीब, बड़े-छोटे, ऊंचे-नीचे, सवर्ण-अवर्ण का भेद अंग्रेजी में झलकता है। विज्ञापन और मीडिया इसके अस्त्र हैं जो हमें ‘परफेक्ट कल्चर’ की ओर ले जा रहे हैं। संपूर्णता की तलाश जीवन हो सकता है, लेकिन जीवन संपूर्ण नहीं है। इसलिए उसे सुंदर और बेहतर बनाने की खोज मनुष्यता का सबसे बड़ा लक्षण है। खोज एक बेहतर शिक्षक की भी हो सकती है, मगर संपूर्णता का भ्रम पाल कर नहीं। हमने सदैव अपने समय को बेहतर उदाहरणों से नवाजा है। शिक्षा के क्षेत्र में भी मिसाल कायम करनी होगी। ‘परफेक्ट’ बनने की होड़ से ऊपर उठ कर सार्थकता की दिशा में सोचा जाए तो शिक्षा को निश्चय ही बेहतर विकल्प मिलेगा।
पूजा खिल्लन
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