छह साल बाद गांव गया था। इतने दिनों में काफी कुछ बदल गया है। सीतामढ़ी का छोटा-सा रेलवे स्टेशन अब बड़ा बन गया है। सीतामढ़ी से सोनबरसा के लिए लंबा-चौड़ा उच्चमार्ग भी बना है। बहुत कुछ नया-सा लग रहा था। मुझे एक व्यक्ति से पूछना पड़ा कि मैं सही दिशा में ही जा रहा हूं या नहीं। अपने चौक पर बस से उतरा तो देखा कि वहां अब बड़ी-बड़ी दुकानें बन गई हैं। सड़कें पक्की हो गई हैं।

यकीन नहीं हुआ कि मैं अपने घर की गली भूल गया था। दूसरे के घर की ओर जा रहा था कि रिश्ते में चाची लगने वाली एक वृद्ध महिला ने मेरा हाथ पकड़ा और मेरी अपनी भाषा बज्जिका में ही बोली- ‘के छा, रमेश? बउआ तोहर घर त एन्ने हौ!’ (कौन हो, रमेश? तुम्हारा घर तो इधर है!) कितने दिनों बाद अपने आसपास यह भाषा सुनी! खैर, पांच-छह दिनों तक घर रहा। बाहर से बहुत कुछ बदल गया है।

पारिभाषिक शब्दावली में शायद इसे ही विकास कहते हैं। लेकिन शिक्षा की हालत और सोचने-समझने का तरीका मुझे निराश कर रहा था। बच्चों से लेकर युवा तक, सबकी जुबान पर गालियां या अपशब्द सामान्य थे। बातचीत करने का सलीका दुखी करने वाला था।

इसके पीछे कारण सामाजिक-सांस्कृतिक रहे हैं। लेकिन मौजूदा समय में जिस तरह पूरे इलाके में मैंने भोजपुरी फिल्मों और गानों का जोर देखा, उसने नई पीढ़ी पर बहुत गहरा असर डाला है। आमतौर पर लाउडस्पीकरों, मोबाइलों में बजते भोजपुरी गीतों पर से अब पहले की तरह ‘द्विअर्थी’ का परदा भी उतर गया है। अब सीधे ‘एक अर्थ’ में अश्लील शब्दों से तैयार गीत कई बार इतने अश्लील फूहड़ होते हैं कि अगर कोई व्यक्ति अपने परिवार और महिलाओं के साथ हो तो उसे बेहद शर्मिंदा होना पड़ता है। लेकिन ये गीत आज बाजार में बज और बिक रहे हैं और गांव तक के बच्चों की जुबान पर आम हो चुके हैं।

इसका प्रभाव न केवल बच्चों की शिक्षा पर पड़ रहा है, बल्कि आर्थिक नुकसान का भी यह एक महत्त्वपूर्ण कारण बन रहा है। सीतामढ़ी में कुल चार-पांच सिनेमा हॉल हैं और लगभग सभी में आमतौर पर भोजपुरी फिल्में लगी रहती हैं। उन्हें देखने भारी भीड़ आती है। सवाल है कि ये दर्शक कौन हैं? गांव के मजदूर किसान और उनके बाल-बच्चे, जिनके पास न सोचने-समझने के हालात हैं, न सुविधा।

दो वक्त की रोटी के जुगाड़ के बाद कभी-कभार भोजपुरी फिल्मों का मनोरंजन। उनकी सीमा यही है। लेकिन वह इन फिल्मों और गीतों से अपने पहले के पारंपरिक सोच में और क्या इजाफा कर रहा है? एक समय था जब ‘नदिया के पार’, ‘गंगा किनारे मोरा गांव’ जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक भोजपुरी फिल्में बनती थीं, जिन्हें परिवार के साथ देखना अच्छा लगता था। लेकिन आज भोजपुरी फिल्में और गाने अश्लीलता के कारोबार में नए कीर्तिमान बना रहे हैं।

एक बार भोजपुरी फिल्मों के तीन अभिनेता- रविकिशन, मनोज तिवारी और दिनेश लाल यादव से कपिल शर्मा ने अपने शो में पूछा था कि आप बॉलीवुड की किस अभिनेत्री को भोजपुरी सिनेमा में लेना चाहेंगे, तो इसके जवाब में मनोज तिवारी ने मल्लिका शेरावत का नाम लिया था। मनोज तिवारी का तर्क यह था कि मल्लिका शेरावत को अपना जिस्म दिखाने में बिल्कुल शर्म नहीं आती है और भोजपुरी फिल्म के दर्शक यही चाहते हैं।

सवाल है कि क्या भोजपुरी फिल्मों के दर्शक सचमुच यही चाहते हैं? पूरे ग्रामीण समाज को एक स्त्री के शरीर में समेट देने के पीछे असली मकसद क्या हो सकता है? क्या इससे अलग ग्रामीणों का कोई अस्तित्व नहीं है? अश्लीलता के बाजार में नुकसान चाहे किसी व्यक्ति का या समूचे समाज का हो, इससे उसके कारोबारियों को कोई मतलब नहीं हैं। मुश्किल यह है कि इस तरह की फूहड़ता को रोकने के लिए कोई पहल नहीं हो रही। देश की संस्कृति को बचाने वालों को भी अश्लीलता और फूहड़ता से संस्कृति पर खतरा नहीं लगता। जागरूक लोगों को भी भारतीय संविधान में मौजूद प्रावधानों का सहारा लेकर सार्वजनिक स्थानों पर ऊंचे स्वर में बजते गाने पर रोक लगवाना जरूरी नहीं लगता।

अश्लीलता और फूहड़ता के कारोबार के लिए केवल साधारण सुनने और गाने बेचने वाले लोग जिम्मेदार नहीं हैं। वह कौन-सी शासन व्यवस्था है, जिसने इन सबको इतना खुला छोड़ दिया है? आखिर इसके पीछे वजह क्या हो सकती है? क्या हमारी सत्ताएं चाहती हैं कि साधारण और गरीब लोग ऐसी अश्लीलता के सपने में डूबे रहें और बुनियादी जरूरतों, पढ़ाई-लिखाई और अधिकारों के बारे में न सोचें? क्या यह नशीले पदार्थों के कारोबार की तरह नहीं है? अगर समय रहते, इस समूचे जहरीले माहौल पर काबू नहीं किया तो भविष्य एक अंधेरी दुनिया के रास्ते पर है।

रमेश कुमार राज

 

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