बाजार से लौटते हुए कूड़ेदान के पास से रिक्शा गुजरा तो तेज बदबू आई। इस कूड़ेदान के पास वाली सड़क पर बड़े-बड़े गड्ढे हैं। अक्सर गाड़ी, साइकिल या रिक्शा के पहिए इन गड्ढों में फंसते रहते हैं। पैदल चलने वाले भी बच-बच कर चलते हैं। इनमें आमतौर पर पानी भरा रहता है। यहां के नेता बदलते रहते हैं, लेकिन इस सड़क के टुकड़े का भाग्य कभी नहीं बदलता।
क्या इन गड्ढों में डेंगू के मच्छर नहीं पल रहे होंगे? क्या यहां से गुजरने वाले न जाने कितने लोगों के कपड़ों, शरीर, सामान से चिपक कर बीमारी फैलाने वाले जीवाणु-विषाणु घर में अतिथि बन कर नहीं पहुंच रहे होंगे? रिक्शा जितनी देर में वहां से गुजरा, इस बीच मैंने एक भयानक दृश्य देखा। कूड़ेदान की दीवार से सटा सफेद कमीज और नीली पैंट पहने एक आठ-नौ साल का बच्चा बैठा था। उसके कपड़े बहुत गंदे थे। उसके सामने कूड़े से छांटी गई चीजों से भरी दो बोरियां भी रखी थीं।
मन में तमाम तरह के खयाल आने लगे। यह बच्चा यहां क्यों बैठा है? मैंने सोचा कि हो सकता है यह बच्चा कूड़ा बीनने वाला हो। अक्सर इन कूड़ेदानों से महिलाएं, बच्चे, बड़े सब कूड़ा बीनते नजर आते हैं। जब मुझे इतनी दूर से इतनी बदबू आ रही है तो यह कूड़ेदान के इतने पास कैसे बैठा है? क्या इसे बदबू नहीं आ रही? या फिर गंदगी में काम करते-करते आदमी का वह तंत्र समाप्त हो जाता है जो बदबू और खुशबू को पहचानता है? अगर इसी पहचान में लगा रहे तो क्या यह कूड़ा बीनने वालों की तरह कूड़ेदानों के आसपास भी फटकेगा? लेकिन नहीं फटकेगा तो आखिर खाएगा क्या? इसकी रोजी-रोटी किसी पांच सितारा होटल से नहीं, इसी कूड़ेदान से चलती है। और हम रोजमर्रा की घटना समझ कर इसे भूल भी जाते हैं।
जिस सफाई या स्वच्छता की बात इन दिनों फिजां में गूंज रही है, आखिर यह बच्चा और इसी जैसे सैकड़ों बच्चे उसमें शामिल क्यों नहीं हैं? क्यों इनके लिए कोई नहीं सोचता? हर रोज की बदबू और गंदगी इनकी तकदीर में क्यों लिखी है? मैंने देखा था कि उस बच्चे के आसपास पानी भरा हुआ है। क्या इसने सरकार की चेतावनियों को नहीं सुना कि जहां भी पानी भरा हो वहां, कूड़ा इकट्ठा हो वहां मलेरिया या डेंगू का मच्छर आसानी से पनपता है? अगर इसे बीमारियों के बारे में पता रहा होगा, तो यह यहां क्यों बैठा है? यह क्यों स्कूल नहीं जाता?
मन ने खुद को ही धिक्कारा कि अगर स्कूल जाता होता तो यहां क्यों बैठा होता! क्या पता इसके माता-पिता को इसकी कितनी चिंता है! चिंता कर सकने की हालत में भी वे हैं या नहीं! लेकिन चिंता होती तो क्या इतनी आसानी से वे ऐसी जगह भेजते जहां से कोई खतरनाक बीमारी होने का खतरा है? क्या पता इस देश के हजारों अनाथ बच्चों की तरह इसके माता-पिता हैं भी कि नहीं। इसके रहने का कोई ठौर-ठिकाना! कहां होगा? कोई फुटपाथ, सड़कें या ऐसे कूड़ेदान! रेलवे, प्लेटफार्म, पुल, सीढ़ियां, कोई खंडहर या कोई टूटा-फूटा ट्रक या मालगाड़ी का डिब्बा।
पता नहीं, इन बच्चों के लिए काम करने वाले संगठनों की नजर इस पर पड़ती है या नहीं! सवेरे से इसने कुछ खाया भी है या नहीं। अगर खाया भी हो तो खाने से पहले हाथ धोने के लिए पानी और साबुन का इंतजाम हो पाया होगा कि नहीं। अक्सर बताया जाता है कि कुछ भी खाने से पहले साबुन से हाथ धोएं। लेकिन साबुन की तो बात ही क्या, आजकल तो मुफ्त में कहीं पानी भी नहीं मिलता। प्याऊ और राहगीरों के लिए रखे जाने वाले मटके तो गए जमाने की बात हो गए हैं।
लेकिन हमारी सारी चिंताएं या चिंताओं को प्रकट करने के केंद्र में शायद ऐसे बच्चे नहीं होते हैं। हमें ऐसे बच्चे सिर्फ कुछ आंसू बहाने, हमदर्दी दिखाने और खुद को गरीबों और वंचितों का सबसे बड़ा मसीहा कहलाने तक ही अच्छे लगते हैं। इनकी गरीबी, इनकी मुसीबत को दूर करने के खयालों से हम खुद महान बनने का सपना जरूर देखते हैं। लेकिन सच यह है कि जमीनी स्तर पर हमारी ऐसी हर चिंता से, हर योजना से ये बाहर ही रहते हैं। हर खतरनाक बीमारी और संक्रमण इनकी खबर लेते हुए इनके पास से गुजरता है। इनकी जान भी जाती होगी तो किसी को पता नहीं चलता, क्योंकि हमारी चिंता के केंद्र में तो वे बच्चे होते हैं, जो हम जैसे दिखते हैं। जिनके कपड़े उजले और चेहरा चमकीला होता है और जो किसी कूड़ेदान के पास बैठे कभी नहीं मिलते।
क्षमा शर्मा
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