इस जाबांज आईपीएस अफसर के बारे में कहा जाता है कि जहां कहीं भी उनकी पोस्टिंग होती है वहां अपराधी या तो अपराध छोड़ देते हैं या फिर बेल तुड़वा कर जेल चले जाते हैं। यूपी के कई जिलो में अपनी सेवा दे चुके पुलिस अफसर अमिताभ यश ने अपनी पढ़ाई St. Stephen’s College, Delhi और IIT, Kanpur से की है। अमिताभ यश 1996 बैच के आईपीएस अफसर हैं। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के तौर पर उन्होंने सहारनपुर, नोएडा, बुलंदशहर, बाराबंकी और जालौन में अपनी सेवा दी है। इसके अलावा वो कानपुर, मुरादाबाद और बांद में डीआईजी के पद पर रहे जबकि गोरखपुर में आईजी के पद पर भी तैनात रहे।
एक साक्षात्कार में अमिताभ यश ने कहा था कि ‘मेरी परवरिश ही थाने की है। उन्होंने बताया था कि उनके पिता भी पुलिस में थे और पढ़ना-लिखना भी उन्होंने थाने के टेबल से सीखा। कई बार अमिताभ यश बैरक में ही भोजन भी किया करते थे। हालांकि अमिताभ यश ने खुद कहा था कि उनके पिता जी चाहते थे कि वो पुलिस सेवा ज्वायन ना करें लेकिन फिर भी उन्होंने पुलिस सेवा ज्वायन किया।
‘निर्भय गुर्जर गैंग’ का सफाया
पुलिस ऑफिसर के तौर पर अमिताभ यश को ऑपरेशन विशेषज्ञ माना जाता है। जब अमिताभ यश जालौन में पोस्टेड थे तब उस वक्त उन्होंने ‘निर्भय गुर्जर गैंग’ का सफाया कर दिया। बताया जाता है कि इस गैंग के सदस्य बेहद कुख्यात थे और बड़े-बड़े अपराध को अंजाम दिया करते थे। साल 2007 में इस बहादुर अफसर को Gallantry अवार्ड से सम्मानित किया गया। इसके बाद उन्हें यूपी पुलिस के स्पेशल टास्क फोर्स का जिम्मा भी दिया गया था।
ददुआ का अंत
कभी चित्रकूट में आतंक का दूसरा नाम रहे शिवकुमार पटेल उर्फ हाफिज उर्फ ददुआ के एनकाउंटर का श्रेय भी अमिताभ यश को जाता है। कहा जाता है कि 70 के दशक से अपराध की दुनिया में एक्टिव ददुआ बेहद क्रूर था। जनार्दन सिंह के सरेंडर के बाद 1982 में उसने अलग गैंग बनाया। उसपर लूट, मर्डर, नरसंहार, किडनैपिंग और वसूली के कई मामले दर्ज थे। ददुआ के बारे में कहा जाता है कि वो इतना कुख्यात था कि कई सफेदपोश भी उससे खौफ खाते थे। उसने अपने परिवार के सदस्यों को बाद में राजनीति में भी उतारा। कई मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया था कि वो चुनाव के वक्त गांव के लोगों के लिए फरमान जारी करता था कि किसे वोट देना है…?
साल 2007 में ददुआ के खात्म के जिम्मा एसटीएफ के जरिए अमिताभ यश को मिला था। कहा जाता है कि उन्होंने ददुआ के बारे में जानकारी जुटाने के लिए पहले ठोस नेटवर्क तैयार किया था। बेहद ही गुप्त तरीके से अमिताभ यश ने अपनी टीम के साथ मिलकर डकैत ददुआ को जंगल में मौत की नींद सुला कर उसके आतंक का खात्मा कर दिया। 22 जुलाई 2007 को चित्रकूट के झलमल जंगलों में डेरा डाले हुए ददुआ को अमिताभ यश की टीम ने घेर लिया। कहा जाता है कि एक घंटे तक चले मुठभेड़ के बाद ददुआ का खात्म हुआ था।
छोटा पटेल का खात्मा
इस एनकाउंटर के करीब तीन महीने बाद ददुआ के दाहिने हाथ छोटा पटेल का लोकेशन ट्रेस हुआ। इसके बाद अमिताभ यश अपनी टीम के साथ जंगलों में उतर गये। एसटीएफ और छोटा पटेल के बीच रूक-रूक कर गोलीबारी होती रही। दिन ढलने के करीब था। गोलीबारी रुक नहीं रही थी। बताया जाता है कि भयंकर गर्मी और उमस में एसटीएफ के पास पानी खत्म हो गया था। लेकिन जांबाज जवानों ने हिम्मत नहीं हारी। आखिरकार छोटा पटेल मारा गया।
विकास दुबे एनकाउंटर
कानपुर के चर्चित बिकरु गांव में 8 पुलिसवालों की हत्या के बाद फरार विकास दुबे की खोज में स्थानीय पुलिस लगी हुई थी। इसी बीच उसकी खोज का जिम्मा एसटीएफ के मुखिया अमिताभ यश को दिया गया। वे तुरंत एक्शन में आए और विकास की खोज शुरू हुई।
इसके तहत सबसे पहले उन्होंने हरियाणा, बिहार और एमपी की सीमाओं पर सतर्कता बरतने को कहा। जल्दी ही विकास उज्जैन में पकड़ा गया। तुरंत ही यूपी से टीम उसे लेने पहुंची। हालांकि यूपी लाते हुए पुलिस की उस गाड़ी का एक्सिडेंट हो गया, जिसमें विकास था। गाड़ी पलटने के बाद दोषी ने भागने की कोशिश की और पुलिस पर हमला भी किया। तभी टीम ने आत्मरक्षा की कोशिश और इस दौरान उसका एनकाउंटर हो गया।

