भारत की राजनीति में गहमागहमी मची हुई है। किसी को आने वाले मौसम की मार से निपटने की चिंता नहीं है। प्राकृतिक आपदाओं में हर वर्ष हजारों जानें चली जाती हैं, लेकिन हमारे नेताओं को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

बाढ़, तूफान, गरमी, सुनामी, भूकम्प, फ्लू, डेंगू और बुखार से हर वर्ष लोग मरते रहते हैं, यह एक सामान्य घटना भर होती है। लोग पहले घोटाले करने में व्यस्त रहते हैं फिर एक-दूसरे की पोल खोलने में। सवाल है कि क्या भारत प्राकृतिक आपदाओं से निपटने और अपने नागरिकों को सुरक्षा मुहैया कराने में पूरी तरह सक्षम है?

उत्तराखंड में बारिश फिर शुरू हो चुकी है। गुजरे वित्तीय वर्ष 2014-15 में राज्य आपदा प्रबंधन महकमा बजट खर्च में सबसे पीछे रहा है। महकमे ने 1556.95 करोड़ बजट प्रावधान की धनराशि में से महज 2.31 करोड़ यानी एक फीसद से कम 0.54 फीसद बजट का इस्तेमाल किया। वहींं मुंबई महानगर में हुई बारिश ने फिर एक बार आपदा प्रबंधन की पोल खोल दी। रेलवे लाइनों पर भारी जलभराव के कारण मुंबई शहर की जीवनरेखा कहलाने वाली उपनगरीय रेल सेवा बुरी तरह प्रभावित हुई है। इस वजह से नौकरीपेशा लोगों को समय से दफ्तर पहुंचने में खासी परेशानी उठानी पड़ी।

कुछ ही दिन पहले चिलचिलाती गरमी और लू के थपेड़ों से देश के विभिन्न भागों में करीब दो हजार दो सौ से अधिक लोगों की मौत हो गई। जिसमें आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में करीब अठारह सौ लोगों की मौत हुई थी। नेपाल में आए भूकम्प ने नेपाल में तो तबाही मचाई ही भारत के निकटवर्ती राज्य बिहार और बंगाल भी उसकी चपेट में आ गए। सरकार को आपदा से बचने की कारगर नीति बनानी चाहिए।

शैलेंद्र चौहान, प्रतापनगर, जयपुर

 

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