खेलों के प्रति विश्व का नजरिया बदल चुका है। पहले देश के वैज्ञानिकों, महान नेताओं आदि उसकी पहचान हुआ करते थे। अब तो कुछ खिलाड़ियों की वजह से देश को पहचान मिलती है। वक्त की जरूरत है कि नई शिक्षा नीति में खेल को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए।
इससे एक ओर तमाम प्रतिभा के बावजूद ग्रामीण क्षेत्र के खिलाड़ियों को उभरने का मौका मिलेगा तो इसकी तरफ खेल के माध्यम से देश में अनुशासित लोगों की फौज खड़ी होगी। यकीनन बिना अनुशासन के राष्ट्र को विकसित नहीं किया जा सकता।
यही कारण है कि तमाम विकसित मुल्क अपने प्राथमिक विद्यालयों को शिक्षा का नहीं, बल्कि अनुशासन की पाठशाला में तब्दील कर चुके हैं। इस क्षेत्र में हमें जापान से सीख लेनी चाहिए। जहां बालकों को विद्यालय में तीन साल तक सिर्फ अनुशासन का पाठ पढ़ाया जाता है।
नाभिकीय हथियारों के हमले के बाद किसे यकीन था कि एक दिन जापान विश्व के शेष विकसित देशों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा दिखाई देगा। आखिर जापान के लोगों ने यह करिश्मा कैसे कर दिखाया? अगर जापान के क्रमिक विकास पर ध्यान दिया जाए तो शिक्षा-व्यवस्था में अनुशासन का केंद्र बिंदु बनना है।
अफसोस की बात है कि तमाम प्रतिभा होने के बावजूद हमने शिक्षा-व्यवस्था से अनुशासन को गायब कर दिया। जबकि वैदिक सभ्यता की शिक्षा-व्यवस्था का पूरा आलंब अनुशासन पर टिका था।
संभवत: प्राचीन भारतीय शिक्षा-व्यवस्था में किसी अन्य देश के मुकाबले अनुशासन पर अधिक ध्यान दिया गया। क्या नई शिक्षा नीति में उस अनुशासन के अवयवों पर ध्यान दिया जाएगा। जो हमारे सपनों का भारत बनाने में निर्णायक हैं।
धर्मेंद्र दुबे, वाराणसी
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