पांचवें दशक में बनी बच्चों की एक फिल्म ‘जागृति’ में कवि प्रदीप का गीत था: ‘हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चो संभाल के।’ इसे स्कूल के एक आदर्श अध्यापक पर फिल्माया गया था। चाचा नेहरू क्योंकि बच्चों की आंखों के तारे थे इसलिए रेडियो पर जब भी यह गीत बजता तो पूरा समय हमारे जहन में मीठी मुस्कान लिए चाचा नेहरू की सौम्य छवि मौजूद रहती थी। कवि प्रदीप ने भी जैसे इस गीत की रचना उस छवि को हृदय में संजोए हुए की होगी। गीत की हर पंक्ति ऐसा ही अहसास कराती है।

जवाहरलाल नेहरू के राजनीतिक जीवन के संघर्षों की गाथा बहुत लंबी और अनेक जटिलताओं से भरी है। पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस का दिन पराधीन और स्वाधीन भारत की ऐतिहासिक संधिरेखा है। रेखा के उस ओर स्वतंत्रता-संग्राम के दिल को दहला देने वाले बहुआयामी परिदृश्य हैं और इस ओर सदियों की गुलामी के कैदखाने से बाहर निकला बदहवास देश है। नेहरू दोनों ओर हैं। उस तरफ निज को भुला कर गांधीजी की छत्रछाया में देश को स्वाधीन कराने की जद्दोजहद में जूझते नेहरू और इधर आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में देश के नव-निर्माण का हिमालय-सा दायित्व संपूर्ण गरिमा और शालीनता के साथ निभाते हुए नेहरू।

नेहरूजी की राह में कितनी चुनौतियां रही होंगी, कितने जोखिम रहे होंगे, इसका अनुमान लगाना जितना सहज है उतना ही कठिन भी। पर कुछ नैसर्गिक गुणों और कठिनाइयों से जूझते रहने के लंबे अभ्यास ने नेहरूजी के व्यक्तित्व को एक विलक्षणता प्रदान की। संवेदनशीलता और सुदृढ़ता का सुमेल, अध्ययन एवं लेखन को समर्पित, गहन इतिहास-बोध और भविष्य-दृष्टि से संपन्न, सतत आत्म-निरीक्षण करते रहने वाला एक अंतमुर्खी व्यक्तित्व! स्वदेश के लिए अपना पूरा जीवन खपा देने वाले ऐसे इंसान को चुनौतियां और जोखिम कमजोर नहीं कर सकते थे। थकी-टूटी देह के जर्जर होते चले जाने के बावजूद। प्रधानमंत्री के रूप में नेहरूजी ने सत्रह वर्ष देशवासियों के दिलों पर राज किया।

सत्ताईस मई उन्नीस सौ चौंसठ की वह उदास दोपहर आज भी याद आती है तो आंखें नम हो जाती हैं। नेहरूजी के आकस्मिक महाप्रस्थान की खबर से जैसे घर-घर में मातम छा गया था। आंसुओं के सैलाब में डूब गया था देश। बहुत वक्त लगा था उबरने में। ‘जय बोलो ऐसे जीवन की जो जल-जल कर बन गया सूर्य’, ‘अब कब दर्शन दोगे!’ -पत्र-पत्रिकाओं में दिनकर, नीरज और न जाने कितने सुप्रसिद्ध कवियों की ऐसी कविताएं उन दिनों पाठकों को रुला देती थीं। आज भी, खासकर जब हमारे नेता अपनी खराब राजनीतिक विरासत को लेकर दुखी महसूस करते हैं तब नेहरूजी और उनकी राजनीतिक विरासत बहुत याद आती है।
’शोभना विज, पटियाला