काफी लंबे वक्त के बाद मध्य एशिया के देशों की यात्रा पर किसी भारतीय प्रधानमंत्री का जाना हुआ है। ‘लुक इस्ट’ पॉलिसी के तहत इससे पहले हमने मध्य एशिया पर ध्यान न के बराबर ही दिया। लेकिन अब इन देशों को नजरअंदाज करना हमारे लिए हितकारी नहीं होगा, क्योंकि आने वाले समय में भारत में ऊर्जा की मांग बढ़ती ही जाएगी, जिसके लिए हमें मध्य एशियाई देशों के साथ बेहतर ताल-मेल बनाना होगा।

क्योंकि इन देशों के पास ऊर्जा का असीम भंडार है जिससे हम अपनी जरूरत को पूरा कर सकते है। बहरहाल, इस समय भारतीय विदेश नीति में एक अनूठा बदलाव देखने को मिल रहा है जहां एक तरफ भारत अमेरिका में नजदीकियां बढ़ी हंै, वहीं वह विश्व के अन्य बड़े देशों से भी अपने संबंध बेहतर बनाने की कोशिश कर रहा है।

अब तक भारत की विदेश यात्राओं में कूटनीति प्रमुख थी, लेकिन अब उसके साथ-साथ व्यापार भी प्रमुख हो गया है। इन्हीं में एक बड़ा कदम प्रधानमंत्री मोदी का मध्य एशिया दौरा है। यह दौरा मुख्यत: ‘ब्रिक्स’ और ‘संघाई सहयोग संगठन’ (एससीओ) को लेकर है। जहां यह उम्मीद की जा रही है कि एससीओ में भारत और पाकिस्तान को स्थायी सदस्यता दी जाएगी। ये दोनों देश अब तक पर्यवेक्षक के रूप में एससीओ में शामिल थे।

अगर पूरे संगठन के उद्देश्य पर नजर डालें तो ऐसा लगता है कि आगे चल कर यह यूरोपीय और अमेरिकी आर्थिक वर्चस्व को चुनौती देने वाला समूह बनेगा। ब्रिक्स बैंक को विश्व बैंक की तर्ज पर विकसित किए जाने की योजना है, जो एशियाई देश, खासतौर से विकासशील देशों के लिए बेहद जरूरी है। क्योंकि यूरोजोन और आइएमएफ के शिकंजे से तीसरी दुनिया के ज्यादातर मुल्क परेशान हैं, इसका ताजा उदाहरण यूनान है।

यहां कुछ पेच भी हो सकते हैं, जैसे कि पाकिस्तान अब तक सभी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठाता रहा है, क्या एससीओ में भी उसका वही रवैया रहेगा? लेकिन इसके आसार कम ही नजर आते हैं। क्योंकि यह मंच द्विपक्षीय वार्ताओं के लिए नहीं बना है, ऐसा सभी सदस्य देश जानते हैं। दूसरा मुख्य प्रश्न यह है कि क्या चीन अपने ‘एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर बैंक’ के अलावा ब्रिक्स बैंक को पूरी मजबूती से सहयोग दे पाएगा?

धीरेंद्र गर्ग, सुल्तानपुर

 

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