प्रधानमंत्री मोदीजी के अनेक जुमलों में से एक ‘न खाऊंगा और न खाने दूंगा’ को ही ले लीजिए, जिसके अति प्रचार-प्रसार के कारण उन्हें जरूरत से ज्यादा शोहरत हासिल हुई, उसका हश्र सबके सामने है।
भारतीय वन सेवा के कर्मठ और ईमानदार अधिकारी संजीव चतुर्वेदी एम्स में मुख्य सतर्कता अधिकारी थे, उन्होंने जब वहां से भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए कुछ मामले उजागर किए तो अपराधियों को सजा देने के बजाय संजीव चतुर्वेदी को प्रताड़ित किया गया और उन्हें वहां से हटाया भी गया।
चतुर्वेदी ने अनियमितताओं के बारे में दस्तावेजी साक्ष्य प्रधानमंत्री कार्यालय को भेज कर अपराधियों को दंडित करने के लिए निष्पक्ष जांच की मांग की थी जिसके कारण उन्हें प्रताड़ित किया और वहां से हटा दिया गया।
बकौल चतुर्वेदी के वे तो स्वतंत्र न्यायपालिका के कारण ही टिके हुए हैं। जहां हमारी लोकप्रिय सरकार का यह सलूक रहा, वहीं अंतरराष्ट्रीय ख्याति के रेमन मैगसायसाय पुरस्कार फाउंडेशन ने चतुर्वेदी को उनकी बेमिसाल सत्यनिष्ठा, साहस और बेईमानी के खिलाफ समझौता नहीं करने की दृढ़ता और पूरी लगन और मेहनत से भ्रष्टाचार उजागर करने के लिए पुरस्कृत किया।
श्याम बोहरे, बावड़ियाकलां, भोपाल
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