यह घटना 1992 की है। इस वर्ष डॉ एपीजे अब्दुल कलाम रक्षामंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार नियुक्त हुए थे। दरअसल, इस पद पर रहते हुए वे डीआरडीओ की सभी प्रयोगशालाओं के प्रमुख थे। एक दिन हमें सूचना मिली कि कल हमारे संस्थान ‘डिफेंस इंस्टिट्यूट आॅफ फिजिओलोजी एंड अलाइड साइंसेज’ (डिपास) में डॉ कलाम का दौरा है।
तब हमारी यह प्रयोगशाला दिल्ली कैंट में थी। फलस्वरूप, हम सब लोग उनकी विजिट की तैयारियों में जुट गए। चूंकि यह उनका पहला दौरा था, सभी अधिकारी और कर्मचारी सुबह से ही सफाई में जुट गए। सफाईकर्मी भी अपनी सुस्ती को तिलांजलि देकर इधर-उधर से कूड़ा-कचरा साफ कर उसके ढेर बनाने लग गए। दोपहर तक कूड़े के ढेर जगह-जगह बनाए जा चुके थे और अब दोपहर बाद उन्हें वहां से हटा कर ऐसी जगह इकठ्ठा करना था, जहां से उन्हें फिर एक ट्रक में भरवा कर बाहर भेजा जा सके। कल कलाम साहब के आने तक सभी कुछ साफ-सुथरा होना चाहिए- ऐसा हम सभी का उद्देश्य था।
अभी लंच होने में कुछ वक्त शेष था कि प्रयोगशाला में हड़कंप मच गया। कलाम साहब कल के बजाय आज ही अपने दौरे पर आ गए थे। खैर, अब क्या हो सकता था? उनके इस अचानक आगमन से सब सहमे हुए थे। उनकी अगवानी करने वाले एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने जब उनसे कहा, ‘सर, हमें तो यह बताया गया था कि आप कल आने वाले हैं’ तो वे मुस्कराते हुए बोले, ‘मैं सोचता हूं कि यह मेरी प्रयोगशाला है और मैं यहां कभी भी आ सकता हूं।’
सुभाष लखेड़ा, द्वारका, नई दिल्ली
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