भूजल का गिरता स्तर पर्यावरणविदों के साथ समाज के सभी लोगों के लिए चिंता का सबब बना हुआ है। बहते पानी के स्रोतों का उपयोग सब नहीं कर सकते, ऐसे में भूजल की महत्ता और भी बढ़ जाती है। मौसम और भू-जल का संबंध लगभग प्रतिकूल होता है क्योंकि गर्मी के दिनों में जमीन के अंदर का पानी ठंडा और ठंड के मौसम में गर्म होता है। भूजल सस्ता और सुविधाजनक भी है।

सतही पानी की तरह इसके प्रदूषित होने का डर भी नहीं होता है। भूजल, प्राकृतिक बरसात और नदियों के जल का जमीन के नीचे रिसाव होने से एकत्र होता है। इसकी अपनी एक पारिस्थितिकी होती है। समुद्री क्षेत्रों में जलस्तर गिरने से खारे जल का रिसाव जमीन में शुरू हो जाता है जिससे वहां का पानी नमकीन हो सकता है।

जल के प्रदूषित होने का एक बड़ा कारण खेती में प्रयुक्त हो रहे कीटनाशक भी हैं जो पानी के साथ भूगर्भ जल में मिलकर उसे प्रदूषित करते हैं। ऐसे में लगातार गिरते जल स्तर और पानी की बढ़ती हुई मांग के बीच आवाज उठ रही है कि नदियों को आपस में जोड़ा जाए लेकिन पर्यावरणविदों के अनुसार ‘नदी जोड़ो परियोजना’ हितकारी नहीं है।

इसका दूसरा पहलू यह है कि इससे मानव विस्थापन की प्रचंड समस्या भी सामने आएगी। भारत में वैसे भी पुनर्वास की स्थिति बहुत बदतर है। हम अपनी जीवनशैली और थोड़ी आवश्यकताओं को संतुलित करके जल का संरक्षण कर सकते हैं। गांव का गरीब आदमी जहां पसीने से सनी हुई कमीज दो-तीन दिन पहनता है वहीं शहरों और महानगरों में लोग अपने बगीचे में लगी विदेशी घास को सींचने और लग्जरी गाड़ियों की धुलाई में सैकड़ों लीटर पानी बर्बाद कर देते हैं।

वाशिंग मशीनों में हजारों लीटर पानी रोज बर्बाद हो जाता है। यदि छोटे-छोटे रोजमर्रा के कामों में हम थोड़ी-सी सावधानी बरत लें तो जल संरक्षण हो सकता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यदि जल नहीं होगा तो हमारा कल भी नहीं होगा।

धीरेंद्र गर्ग, सुल्तानपुर

 

फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta

ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta