संसद के मानसून सत्र में करीब तीस विधेयक पास होने हैं जिनमें वस्तु एवं सेवा कर विधेयक, श्रम सुधार और भूमि अधिग्रहण सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं।
ये आर्थिक सुधारों के लिए बेहद अहम हैं। लेकिन सत्ता के खिलाड़ी बेपरवाह हैं। उन्होंने संसद को हंगामे का मंच बना लिया है। वैसे यह कोई नई बात नहीं है। अगर केंद्र में कांग्रेस की सरकार रहेगी तो भाजपा उसका विरोध करेगी और भाजपा की सरकार है तो कांग्रेस विरोध करेगी।
इस राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के चलते कोई काम आज तक समय पर नहीं हो पाया। सत्र चलने पर एक मिनट का खर्चा करीब ढाई लाख लगभग आता है, लेकिन इन सबकी परवाह किए बगैर हंगामा हो रहा है। यह सिलसिला कब थमेगा?
अमन तिवारी, दिल्ली
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