मार्क्सवाद एक चिंतन पद्धति है, जो संपूर्ण प्रकृति को समझने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रदान करता है। मार्क्सवाद के दार्शनिक आयाम को समझे बिना न तो, मूल्य, मुद्रा, पूंजी, अतिरिक्त मूल्य जैसी वैचारिक कोटियों को समझा जा सकता है और न ही शोषण और उसके खात्मे की प्रक्रिया को।

अतिरिक्त मूल्य का उत्पादन करना और उसके जरिए जीवन को सुगम बनाना मानव प्रजाति का प्राकृतिक गुण है और उत्पादक शक्तियों के विकास के जरिए उत्पादकता बढ़ाना इसी का एक आयाम है। जहां अतिरिक्त मूल्य का उत्पादन केवल मानव श्रम द्वारा वस्तुओं को उपभोग के लिए रूपांतरित करने के दौरान ही किया जा सकता है। वहीं अतिरिक्त मूल्य का हस्तांतरण उत्पादन-उपभोग का चक्र पूरा होने के बाद ही संभव है।

मार्क्स ने रेखांकित किया था कि औद्योगिक क्रांति के बाद उत्पादन-वितरण का स्वरूप वैश्विक हो गया है जिसने दुनिया के मजदूरों को एक कर दिया है, पूंजी को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय स्तर प्रदान कर मुद्रा को उत्पाद में बदल दिया है, पूंजीवाद अपनी उच्चतम औपनिवेशिक अवस्था में पहुंच चुका है, और मुक्त व्यापार का समर्थन एक अग्रगामी कदम है, जो शोषणमुक्त मानव-समाज के लिए आधार प्रदान करेगा।

मार्क्स के इसी सैद्धांतिक विश्लेषण का अनुकरण कर लेनिन यह दर्शा पाए थे कि अविकसित पूंजीवादी व्यवस्था में भी मजदूर-वर्ग संसदीय जनवाद की बागडोर अपने हाथ में ले सकता है। और इसी समझ के आधार पर माओ ने नए जनवाद की अवधारणा विकसित की जिसका अनुकरण कर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी चीन के राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन का नेतृत्व अपने हाथ में रखने में सफल हुई। इसके विपरीत भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी गैर-मार्क्सवादी समझ के कारण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाने में विफल रही।

सुरेश श्रीवास्तव, नोएडा

 

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