केसी बब्बर कीटिप्पणी ‘विज्ञापन का परदा’ (दुनिया मेरे आगे, 18 अगस्त) से उजागर है कि अनुत्पादक व्यय उपभोक्ता की जेब काट कर वसूला जाता है। विज्ञापन की वजह से करीब बीस प्रतिशत अधिक मूल्य चुकाने को मजबूर हैं उपभोक्ता। यह प्रतिशत कम-ज्यादा भी हो सकता है।

कीमतों के अलावा विज्ञापन कई बार जो झूठ फैलाते हैं, बल्कि स्थापित करते हैं, वह सेहत के लिए खतरनाक भी होता है। मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक कीटनाशक युक्त तरह-तरह के शीतल हमारे फिल्मी सितारे और खिलाड़ी ऐसे पेश करते हैं कि इन्हें पीने से एक जोश आता है, वह आनंद आता है जिससे जीवन ज्यादा सफल और सार्थक प्रतीत होने लगता है। कई तरह के सौंदर्य प्रसाधन आपकी त्वचा को कांतिमय बनाएंगे जबकि इनके अधिक उपयोग से कभी-कभी नुकसान भी होता है, कुछ टानिक अधिक शक्ति प्रदान करते हैं। मैगी नूडल्स के एक मामले में ही कार्रवाई हुई है, जबकि अन्य नुकसान पहुंचाने वाले उत्पाद अतिशयोक्ति और झूठ के सहारे बेरोकटोक बिक रहे हैं।

विज्ञापन का गोरखधंधा उत्पादन और उपभोक्ता के बीच ठगी तक सीमित नहीं है। इसने हमारे जनतंत्र पर भी परदा डाल कर उसका अपहरण कर लिया है। अब राजनीति करने के लिए सामाजिक काम करके जगह बनाना उतना जरूरी नहीं है, अब तो विज्ञापनों के जरिए भ्रम फैला कर जनता को ठग कर आसानी से सत्ता हासिल की जाने लगी है।

हाथ कंगन को आरसी क्या! हम भुगत ही रहे हैं। विज्ञापनों ने हमें बताया कि बहुत हुई महंगाई की मार- अबकी बार मोदी सरकार। महंगाई से त्रस्त लोग इस झांसे में आ गए कि मोदीजी को सत्ता में लाओ और महंगाई से निजात पाओ। मोदीजी ने तो हमें उल्लू बनाकर अपना उल्लू सीधा कर लिया। वे सत्ता भोग रहे हैं और हम हैं कि दाल को तरस रहे हैं, प्याज के आंसू रो रहे हैं।

श्याम बोहरे, बावड़ियाकलां, भोपाल

 

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