नब्बे के दशक में जब से आर्थिक सुधारों का दौर शुरू हुआ है, तब से रोजगार आमतौर पर असंगठित क्षेत्र में सिकुड़ते गए हैं। और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की हालत आज क्या हो चुकी है, यह किसी से छिपा नहीं है।

इसलिए श्रम कानूनों में सुधार को अगर मजदूर संगठन ‘श्रमिकों पर गुलामी’ थोपने की कवायद बता रहे हैं तो इस आशंका को गलत साबित करना सरकार की ही जिम्मेदारी है।

अशोक वासुदेव, गांधी विहार, पलवल

 

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