साठ के दशक की बात है। पीतकाक यानी पीतांबर पान वाले को हब्बाकदल पुल (कश्मीर) के इस पार या उस पार रहने वाला मेरी उम्र का भला कौन नहीं जानता होगा? उस जमाने में रडियो सिलोन की बिनाका गीतमाला और क्रिकेट मैचों की कमेंटरी उसके रेडियो पर ही बढ़िया सुनी जा सकती थी।

कद-काठी गजब की और चेहरा-मोहरा रोबीला। हब्बाकदल चौक में पीतकाक अपनी वाक्पटुता और दबंगई के कारण प्रसिद्ध थे। पीतकाक के बगल में ही जिंद पान वाले की छोटी-सी दुकान और हुआ करती थी। हमारी गली में ही उनका घर था।

वे पीतकाक की तुलना में तनिक शांत स्वभाव के थे। पीतकाक मुझसे अक्सर कहते ‘यहां क्या धरा है इस शहर में? रोज-रोज के बंद और कर्फ्यू। निकल जा यहां से। नहीं तो पान ही बेचता रहेगा मेरी तरह जिंदगी भर।’

आज जाने क्यों मुझे पीतकाक याद आ गए। मालूम नहीं इस संसार में वे अब हैं भी कि नहीं! नियति व्यक्ति को कहां से कहां ले जाती है, अब समझ में आ रहा है।

शिबन कृष्ण रैणा, अलवर

 

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