प्रेम कुमार मणि का पत्र ‘योग और विपस्सना’ (24 जून, चौपाल) पढ़ा। इसमें योग (पतंजलि) और विपस्सना (बुद्ध) इन दो महान पुरुषों के विचारों में टकराव उत्पन्न करने की चेष्टा की गई है। इसको पढ़ने से यह प्रतीत होता है कि इसके लेखक को या तो पातंजल योग के अष्टांग मार्ग का किंचित भी ज्ञान नहीं, या फिर उन्होंने जानबूझ कर इन दोनों योग की धाराओं को मानने वालों में विद्वेष उत्पन्न करने के उद्देश्य से यह लेख लिखा है।
सर्वप्रथम योग और विपस्सना को एक-दूसरे के विपरीत बताते हुए लेखक ने लिखा कि यह (योग) स्वस्थ शरीर से स्वस्थ मन की ओर बढ़ता है। बुद्ध (विपस्सना) स्वस्थ मन से स्वस्थ शरीर की ओर बढ़ते हैं।
पातंजल योग को पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह कथन सत्य से कोसों दूर है, क्योंकि योग के आठ अंगों में प्रथम दो अंग यम और नियम हैं।
यम पांच प्रकार का है- एक, अहिंसा यानी सब प्रकार से सब काल में सब प्राणियों के प्रति मन से वैर-भाव छोड़ के प्रेम से व्यवहार करना। दूसरा, सत्य यानी जैसा मन में हो वैसा ही सत्य बोलें, करें और मानें। तीसरा, अस्तेय यानी दूसरे के पदार्थ को उसकी आज्ञा के बिना लेने की मन में इच्छा न रखना। चौथा, ब्रह्मचर्य यानी मन से काम-वासना का त्याग करते हुए उपस्थेंद्रिय का सदा नियम करना। पांचवां, अपरिग्रह यानी विषय और अभिमान आदि दोषों से रहित होना। ये पांचों यम स्पष्ट रूप से मन से संबंधित हैं।
दूसरा अंग है नियम, वह भी पांच प्रकार का है- पहला, शौच यानी भीतर और बाहर की पवित्रता रखना, इसमें सत्य भाषण विद्याभ्यास, सत्संग यह मानसिक पवित्रता है। दूसरा, संतोष यानी धर्म का अनुष्ठान करके सदा प्रसन्न रहना। तीसरा, तप यानी आत्मा और मन को धर्माचरण के आचरण रूप तप से निर्मल करना। चौथा, स्वाध्याय यानी वेदादि सत्य शास्त्रों का पढ़ना-पढ़ाना और ओंकार के विचार से ईश्वर का निश्चय करना-कराना। पांचवां, ईश्वर-प्रणिधान यानी परमगुरु परमेश्वर के लिए आत्मा और मन के प्रेम-भाव से आत्मादि सत्य द्रव्यों का समर्पण करना। ये पांच नियम भी मन से संबंधित हैं।
यम नियम के पश्चात तीसरा योगांग आसन है। आसन के विषय में योग में लिखा है- ‘तत्र स्थिर सुखमासनम’ यानी शरीर और आत्मा जिसमें सुखपूर्वक हों उसको आसन कहते हैं। यह अवस्था भी मन की है। इसके पश्चात चौथा योगांग है प्राणायाम। श्वासप्रश्वास योर्गतिविच्छेद: प्राणायाम:। यानी बाहर से भीतर जाने वाली वायु (श्वास) और भीतर से बाहर आने वाली वायु (प्रश्वास) को विचार से रोकना। विचार मन से होता है इसलिए यह भी मन से संबंधित अंग है। इनसे आगे प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि इन योगांगों का तो सीधा संबंध ही आत्मा और मन से है।
इतने स्पष्ट प्रमाणों के होते हुए लेखक ने योग को स्वस्थ शरीर से स्वस्थ मन की ओर बढ़ने वाला कैसे कह दिया?
इसके अलावा विपस्सना की विशेषता बताते हुए प्रेम कुमार मणि ने लिखा है कि- बुद्ध मानते थे कि मन की उथल-पुथल का शरीर पर प्रभाव पड़ता है। यह कथन सत्य है, लेकिन शरीर की उथल-पुथल का मन पर प्रभाव पड़ता है यह भी उतना ही सत्य है।
अब प्रश्न यह है कि क्या आना-पान सति अर्थात सांसों की विसंगति को ठीक करने से, उन्हें एक लय में लाने से शरीर के अन्य हिस्सों में आए विकारों को देखने में सुविधा होती है? और क्या उनको देख लेने भर से उसका आधार ध्वस्त हो जाता है?
इन दोनों प्रश्नों से अन्य अनेक ऐसे प्रश्न उभरते हैं जिनका विपस्सना वालों के पास कोई उत्तर नहीं है। प्रथम, सांसों को लय में कौन लाता है? उनके लय में आने से शरीर के अंगों का द्रष्टा कौन होता है? और किसके देख लेने भर से उन विकारों का आधार ध्वस्त हो जाता है। इन प्रश्नों का उत्तर केवल योग दर्शन में है और वह है कि सब शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक क्रियाओं (वृत्तियों) का द्रष्टा जीवात्मा है। जबकि बुद्ध दर्शन में जीवात्मा और परमात्मा के लिए कोई स्थान ही नहीं है।
इसके अलावा, प्रेम कुमार मणि ने लिखा है कि बाबा रामदेव अगर योग की जगह विपस्सना करते तो व्यापार की माया में नहीं फंसते; प्रधानमंत्री मोदी अगर आना-पान सति से विपस्सना की ओर बढ़ते तब कई विवादों से दूर रहते। इस विषय में मेरा यह सुझाव है कि हमें अनावश्यक विवाद न उत्पन्न कर सहयोग और सामंजस्य बढ़ाने में अपनी शक्ति लगानी चाहिए।
स्वामी अग्निवेश, दिल्ली
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