याकूब की फांसी को लेकर कई स्तरों पर बहस चल रही है। एक तरफ उसका परिवार है जो इस बहस के मानवीय पक्ष को रेखांकित करता रहा। मगर परिवार तो उन मासूम लोगों के भी थे जिनकी मौत मुंबई बम धमाकों में हुई थी। उस मानवीय पक्ष को भी कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है?

एक और पक्ष फांसी की सजा के विरोधियों का है जो कहते हैं कि हमें जान लेने का हक नहीं क्योंकि हम जान दे नहीं सकते। फांसी की सजा हो या नहीं, इसके पक्ष और विपक्ष में कई तर्क हैं। यह एक बड़ी बहस है और दुनिया के कई मुल्कों में चल रही है। मगर सच तो यह है कि फांसी का प्रावधान देश के कानून का हिस्सा है जिसके तहत याकूब को फांसी दी गई।

एक तर्क यह दिया जा रहा है कि जब याकूब के भाई टाइगर मेमन और उनके रहनुमा दाऊद इब्राहिम को पकड़ा तक नहीं जा सका है तो सिर्फ याकूब को फांसी क्यों? क्या टाइगर और दाऊद के दोषी होने से याकूब निर्दोष साबित हो जाता है? क्या कोई कह सकता है कि याकूब मेमन मुंबई बम धमाकों में शामिल नहीं था? उसे मालूम था कि वह क्या कर रहा है और उसका क्या नतीजा होगा। उसे फांसी एक बहुत लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद सुनाई गई जहां हर बार उसे अपनी बात कहने और खुद को निर्दोष साबित करने का मौका मिला। बल्कि उलटे लोगों की शिकायत तो यह है कि इतने संगीन जुर्म का फैसला आने में इतना ज्यादा वक्त लगना देश के लिए ठीक नहीं है। इससे अपराधियों के हौसले बुलंद होते हैं और इसी कारण भारत को एक ‘सॉफ्ट स्टेट’ माना जाता है।

देश की कई प्रसिद्ध हस्तियों ने भी राष्ट्रपति को खत लिख कर याकूब के लिए नरमी बरतने की प्रार्थना की थी। इन लोगों का तर्क था कि याकूब की मानसिक हालत ठीक नहीं है इसलिए उसे सूली पर चढ़ाना ठीक नहीं होगा। साथ ही यह भी कहा गया कि याकूब ने आत्मसमर्पण किया इसलिए भी उसे फांसी देना ठीक नहीं होगा। वैसे अदालतें इन सब बातों पर गौर कर चुकी हैं, सुप्रीम कोर्ट भी फैसला सुना चुका है लिहाजा इस मसले पर अब किसी भी तरह की तुच्छ राजनीति नहीं की जानी चाहिए। हमें इस मसले को राजनीति से दूर रखना चाहिए।
राहुल यादव ‘ग्वाल’, झांसी

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