विदेश जाकर या विदेशियों को भारत बुला कर मोदी जो भी सौदे कर रहे हैं, उनसे हित किसके पूरे हो रहे हैं? यह दौड़-भाग मलाई और खुरचन के अंतर को पाटती हुई न दिख कर बढ़ाती हुई दिख रही है। मोदी के साथ यात्रा करने वाले उनके साथी व्यापारी जरूर इस मलाई में हिस्सेदारी बढ़ाने को आतुर हैं। आज विश्व की शीर्ष 2000 कंपनियों में सबसे ज्यादा 679 कंपनियां अमेरिका की हैं जबकि भारत की 56 कंपनियों ने इसमें जगह बना ली है। भारत में 2014 के अंत तक कुल व्यक्तिगत संपदा 2574 खरब रुपए रही है। जो पिछले वर्ष के मुकाबले 27.5 प्रतिशत बढ़ी है।
चीन से बराबरी की बात अच्छी लगती है पर हकीकत से आंखें चुराना भी ठीक नहीं है। चीन को हम जितना निर्यात करते हैं, उसका पांच गुना आयात करते हैं। चीन का सकल घरेलू उत्पाद 9240 अरब डॉलर है तो हमारा 1875 अरब डॉलर है। चीन की प्रतिव्यक्ति आय भी हमसे करीब पांच गुना ज्यादा है। तमाम दावों के बाद भी पिछले पांच महीने से औद्योगिक विकास गिरावट के गोते लगा रहा है। न महंगाई रुकी न बेरोजगारी घटी। महामारी और मनमाने दोहन से कुपित प्रकृति की विनाशलीला बढ़ी है। ‘नसीबवालों’ के राज में किसानों, मजदूरों और आमजन का नसीब खराब हो चुका है। कुदरत और अर्थ के बीच पिसती उसकी जिंदगी का खैरख्वाह कोई नहीं है।
भ्रष्ट कांग्रेस के राज में 146 डॉलर प्रति बैरल के भाव के दौर में पेट्रोल 77 रुपए प्रति लीटर बिकता था तो अब कांग्रेस मुक्त ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’ के दावों के बीच 63 डॉलर प्रति बैरल के दाम पर भारत में पेट्रोल बिक रहा है 73 रुपए लीटर। तभी तो सब जगह एक ही स्वर सुनाई दे रहा है ‘तेरी है ना मेरी है, ये सरकार लुटेरी है।’
रामचंद्र शर्मा, तरुछायानगर, जयपुर
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