मानवीय आधार पर या परिवार की अत्यंत आवश्यक रस्म निभाने की खातिर जेल से पैरोल पर बंदियों को एक निश्चित अवधि के लिए रिहा करने की परंपरा ब्रिटिश राज से रही है। भारत में प्रभावी अपराध प्रक्रिया संहिता भी उसी जमाने की है। इस सीआरपीसी में देश की आजादी के बाद मामूली-से संशोधन की मरहम-पट्टी की गई है। यह बात अलग है कि ऐसे खुद्दार व्यक्ति भी रहे जो कैद और आजादी के मायने समझते थे और उपकृत रूप से प्राप्त अल्पावधि आजादी को महत्त्वहीन मानते थे।
डॉ राममनोहर लोहिया के पिता का देहांत हुआ। उस समय डॉ लोहिया आगरा जेल में थे। पिता के अंतिम संस्कार की रस्में पूरी करने के लिए अंगरेज शासन ने स्वयं उनके सामने पैरोल का प्रस्ताव रखा पर डॉ लोहिया ने अंगरेजों से उपकृत के तौर पर मिले इस अधिकार को अस्वीकार कर दिया। डॉ लोहिया के पिता हीरालाल अग्रवाल खुद स्वाभिमानी गांधीवादी नेता थे और स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेकर अंगरेजों के कोप का भाजन बनते रहे थे। इसी तरह आपातकाल में मेरठ के मशहूर शायर हफीज मेरठी ने भी अपने पुत्र के देहांत पर पैरोल पर छूटने से इनकार कर दिया था।
लेकिन फरार अभियुक्त को ‘मानवीय आधार’ पर पैरोल जैसी सुविधा भारत के संहिताबद्ध कानूनी राज में पहली बार सुनने को मिली। क्या यह कल्पना की जा सकती है कि पुलिस द्वारा वांछित किसी व्यक्ति को मानवीय आधार पर गिरफ्तारी से कुछ दिन के लिए छूट मिले और समयावधि पूरी होने पर उसे फरार करा दिया जाए?
ललित मोदी ब्रिटेन में हैं। भारत में अपने विरुद्ध दर्ज आरोपों की जांच में वे सहयोग भी नहीं कर रहे। सरकार की उन पर दरियादिली सात तालों के पीछे किसी गठबंधन की ओर संकेत करती है। ललित मोदी को उनकी पत्नी के इलाज की समुचित सुविधा मिलनी चाहिए पर इस शर्त के साथ कि इलाज की प्रक्रिया पूरी कर उन्हें भारत आकर कानून के तहत आरोपों का जवाब देना और मुकदमे का सामना करना होगा।
यह तथ्य स्वीकार योग्य नहीं होगा कि सरकार के कार्य से किसी आरोपी का ‘स्टेटस’ प्रभावित नहीं हुआ। वह पहले भी फरार था और सरकार की कृपा प्राप्त कर अपने परिवार के प्रति कर्तव्य निभाया और पुन: सरकार की कृपा से पुराने ‘स्टेटस’ में चला गया!
इस विषय पर क्षेत्रीय दल शांत हैं। प्रधानमंत्री को स्वयं वक्तव्य देकर धुंध साफ करनी चाहिए।
नीरू अग्रवाल, मिशन कंपाउंड, मेरठ
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