एक भारतीय होने के नाते हमें अपने संविधान पर पूरा भरोसा है। यह भरोसा तब और बढ़ जाता है जब सलमान खान, संजय दत्त, लालू प्रसाद यादव या जयललिता जैसे रसूख वाले लोगों या बड़े अधिकारियों पर कानून का शिकंजा कसता है। लेकिन ऐसे लोग जब कानून के ही किसी न किसी दाव पेंच से बच जाते हैं और रविंद्र पाटिल (सलमान मामले में मुख्य गवाह) जैसे लोग पहले नौकरी से और फिर जिंदगी से ही हाथ धो बैठते हैं तब हमें इस कानून के प्रति संदेह होने लगता है। यह एक कड़वा सच है कि इस देश में कानून मानने वालों पर तो सब कानून लागू होते हैं लेकिन यही कानून उन लोगों के बचाव में भी खड़े नजर आते हैं जो तमाम कानूनों की सरेआम धज्जियां उड़ाते रहते हैं। कभी-कभी यह संदेह रोष में भी बदल जाता है और लोग नक्सली राह पकड़ लेते हैं। आए दिन ऐसे दर्जनों वाकये होते हैं जब किसी को मामूली गलतियों के लिए सलाखों के पीछे डाल दिया जाता है जबकि पैसे वाले, ऊंचे ओहदे वाले और रसूख वाले लोग कानून को बात-बात पर ठेंगा दिखाते हैं। उस समय हम मौन होकर सब कुछ देखते रह जाते हैं।

एक देश में दो तरह के कानून हमारी नियति हैं या पैसे और पहुंच के बल पर गरीबों के गाल पर वह तमाचा जो हमेशा याद दिलाता रहे कि गरीब होने का मतलब है न्याय से वंचित रहना, गरीब होने का मतलब है पैसे और पहुंच वाले लोगों की गलतियों-गुनाहों को देख कर भी नजरअंदाज करते रहना। यदि ऐसा नहीं करते हो तो तुम्हारा हाल भी सलमान खान के बॉडीगार्ड रविंद्र पाटिल जैसा होगा या उस ड्राइवर जैसा जो पैसे के बल पर खरीद लिए जाता है और सलमान की गलतियों को अपने माथे लेकर कहे कि गाड़ी सलमान नहीं, वही चला रहा था!
सलमान के वकील की दलील थी कि उनके मुवक्किल अपने जीवन में अच्छे काम कर रहे हैं, वे कई तरह की ‘चैरिटी’ चलाते हैं जिससे लोगों का भला हो रहा है। तो क्या समाज में अच्छे काम करने वालों को यह हक मिला हुआ है कि गरीबों को कुचलते हुए निकल जाएं? यदि ऐसा है तो ऐसे हजारों लोग हैं जो दिन-रात आम लोगों के भले के लिए ही काम कर रहे हैं। ऐसे भी लोग हैं जो समाज कल्याण के काम करने के कारण झूठे मुकदमों में फंसा कर जेल में बंद कर दिए जाते हैं। यह कैसा न्याय है?

दूसरी बात यह कि सब जानते हैं कि भ्रष्टाचार से कमाए काले धन को लोगों ने किस तरह चैरिटी और दान कर के जरिए सफेद करने का धंधा बना रखा है। इस देश में अनगिनत लोग हैं जो फुटपाथ पर जन्म लेते हैं और फुटपाथ पर ही मर जाते हैं। ऐसे लोगों के लिए हमारे कानून में कोई जगह नहीं, लेकिन अभिजीत भट्टाचार्य जैसे लोग भी यहां हैं जो ऐसे बेसहारा लोगों को कुत्ता कह कर उनका अपमान करने से नहीं चूकते हैं।

यह भी एक सच्चाई है कि सिने जगत से जुड़े लोगों को जब कभी परेशानी आई है तब पूरा फिल्म जगत एक साथ खड़ा हो गया है। अब भी यही हुआ है। सलमान की कार से कुचले परिवार से मिलने फिल्मी हस्तियों में से कोई नहीं गया लेकिन उन्हें सजा होने के बाद पूरा फिल्म उद्योग उनसे मिलने दौड़ा-दौड़ा गया। पहले पैसे के बल पर न्यायिक प्रक्रिया को लंबा खींचना और जब छोटी अदालत सजा दे तो बड़ी अदालत से जमानत लेकर गवाह और सबूतों को प्रभावित करने का खेल देश के सभी सक्षम लोग करते रहे हैं। इस खेल में हर बार गरीब और बेसहारा लोग मोहरे ही साबित हुए हैं। देश में हुए नरसंहार के अनेक मामलों में भी अंतत: कोई दोषी करार नहीं दिए जाते हैं। यह कितना अफसोसनाक है कि एक क्षेत्र में सैकड़ों लोग मारे जाते हैं लेकिन जांच एजेंसियां हत्यारों को नहीं ढूंढ़ पाती हैं।

कहा जाता है कि प्रत्येक जगह लक्ष्मी (धन) की ही पूजा होती है चाहे वह न्याय का मंदिर ही क्यों न हो। लेकिन गरीबों को हर जगह धैर्य रखने की सलाह दी जाती है। इस मामले में भी हमने अब तक धैर्य ही रखा है। देखते हैं, पैसे और ताकत के बल पर गरीबों को कब तक न्याय से वंचित रखने का खेल चलता है?
अशोक कुमार, तेघड़ा, बेगूसराय

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