‘राजनीति की राह’ (समांतर, 8 मई) शीर्षक से प्रकाशित ब्लॉग में अर्चना राजहंस मधुकर ने राहुल गांधी के व्यक्तित्व, व्यवहार और नेतृत्व की भीतरी परतों को टटोला है और अपनी असहमति के साथ उपयुक्त आशंकाएं जाहिर की हैं। इस घड़ी राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी में बाहैसियत उपाध्यक्ष पद पर काबिज हैं। नेता (?) के रूप में उभरने से पहले वे अज्ञातवास में अध्ययनरत थे। सार्वजनिक जिंदगी में प्रकट हुए, तो उसे कांग्रेस ने अवतार सरीखा तरजीह दिया।

राजनीति में आसानी यह है कि बहुलांश काम पार्टी के कारिंदे और अन्य सदस्य करते हैं। खुद सिर्फ ‘प्रर्जंेटेबल फेस’ बन कर संग-साथ दिखते रहना भर होता है। राहुल जब भी दिखते हैं, कैमरे की फ्लैश चमकती है। अखबार अपने पृष्ठों पर ‘कागद कारे’ करते हैं। आज के अधिसंख्य संचार-माध्यम खबर और विचार का कॉकटेल परोस, प्रसारित कर रहे हैं। आजकल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन्हीं सब ‘इवेंट/ पब्लिसिटी/ इमेज बिल्डिंग’ में नहाए हुए दिख रहे हैं। पूरे देश में ‘पहले शौचालय फिर देवालय’ का बुलंद नारा देकर संघी मानसिकता को हूरपेटने वाले प्रधानमंत्री की माया तक ऐसी कि अपने संसदीय क्षेत्र में भी उनकी कथनी-करनी बीस नहीं बैठ रही। इस ओर ध्यान देना मीडिया की नफासत में नहीं है। हां, उनके चुने जयापुर गांव पर अधिकारियों की मेहरबानी जबरदस्त है।

इसलिए राहुल गांधी इतने दिन राजनीति में ‘ट्रेनिंग’ लेते हुए इतना तो जान ही गए हैं कि गरम कड़ाह के खौलते तेल में पानी का छींटा मारने का अंजाम क्या होता है। चूंकि कांग्रेस में पानी नहीं बचा है। इस कारण वे अपना पसीना बहाते हुए मौजूदा सरकार के ऊपर जल-छिड़काव में दिन-रात जुटे हैं। इस उपक्रम को भी ‘सुपररियलिस्टिक ड्रामा’ की तरह करने के लिए उन्हें विदेशी जमीन पर कठिन अभ्यास करने पड़े। हिंदी शब्दकोश और मुहावरे को साधना पड़ा। चेहरे के भाव-भंगिमा, दैहिक-चेष्टाओं, बात-बनाव, बोल-बरताव, मौन-खामोशी आदि के बीच सही संगति और संतुलन बिठाने के लिए विधि-विधान के साथ तकरीबन आठ सप्ताह तक ‘विपश्यना’ करना पड़ा।

राहुल आज क्या कर रहे हैं, मीडिया दिखा रहा है और कल क्या करेंगे यह मीडिया तय कर चुका होगा। हवाई जहाज में राहुल यात्रा कर रहे हैं और अपने साथ के यात्रियों से बातचीत करने में मशगूल हैं; यह टेलीविजन पर दिखाने के लिए खुद पत्रकार को हवाई-यात्रा करनी पड़ रही है, ट्रेन में बर्थ ‘रिजर्व’ कराने पड़ रहे हैं। मौजूदा जनमाध्यमों के साथ बड़ी विसंगति यह है कि वह अपनी रूप, शैली, अंतर्वस्तु या प्रस्तुति-प्रसारण में वस्तुपरक, निष्पक्ष, पारदर्शी और तर्कसंगत नहीं है। जो हो,जनता सब बूझती है, तब भी सबको अवसर देती है।
राजीव रंजन प्रसाद, बीएचयू, वाराणसी

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