केसी बब्बर का ‘विज्ञापन का परदा’ (दुनिया मेरे आगे, 18 अगस्त) बहुत समय बाद एक सारगर्भित लेख पढ़ने को मिला। जिसमें आज की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था की अंतर्वस्तु को उजागर करने का प्रयास किया गया है। पर अतिरिक्त मुनाफा (सरप्लस वैल्यू) और शोषण के बारे में बात कुछ साफ नहीं है।
एक, आपने कहा ‘कीमत इस आधार पर तय होती है कि उस पर लगा मानव श्रम कितना है’ और कीमत से ‘अधिक लिया गया मूल्य अतिरिक्त मुनाफा है’। कीमत से कितना अधिक मूल्य लिया जा सकता है, यह कैसे तय होता है और कौन तय करता है?
दूसरा, विज्ञापन का मूल्य कैसे तय होता है और अगर विज्ञापन का खर्च अनुत्पादक है अर्थात लागत श्रम का हिस्सा नहीं है तो सरप्लस वैल्यू का हिस्सा क्यों नहीं है?
सुरेश श्रीवास्तव, नोएडा</strong>
फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें- https://www.facebook.com/Jansatta
ट्विटर पेज पर फॉलो करने के लिए क्लिक करें- https://twitter.com/Jansatta
