इंदौर हाइकोर्ट के एक वकील की जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार को पोर्न साइटों पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया। भारत सरकार ने 2 अगस्त को 857 साइट्स पर प्रतिबंध लगाया गया, लेकिन संसद और बाहर, दोनों जगह सरकार के कदम का विरोध हो रहा है। विरोधियों को आपत्ति है कि इससे नागरिकों के निजता के अधिकार का उल्लंघन होगा, क्योंकि उनके मतानुसार घर के अंदर व्यक्ति क्या देखे और क्या नहीं यह उसकी स्वतंत्रता है। असल में विचार-विमर्श का मुद्दा यह होना था कि किन-किन साइट्स को प्रतिबंधित की सूची में डालें और प्रतिबंध पर अमल कैसे हो।

निस्संदेह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता के अधिकार का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन देश और समाज की कीमत पर कतई नहीं। बच्चों और वयस्कों, दोनों की मानसिकता पर इन पोर्न साइट्स का गंभीर दुष्प्रभाव देखने को मिल रहा है, जिसे मासूम बच्चियों से लेकर अधेड़ उम्र की तक की महिलाओं के खिलाफ तेजी से बढ़ रहे यौन-अपराधों के रूप में देख सकते हैं। इन अपराधों के कारण एक से अधिक हो सकते हैं, लेकिन जिस तरह का ‘इनपुट’ बच्चों और युवाओं को मिलेगा उसी तरह के ‘आउटपुट’ की अपेक्षा हम करसकते हैं। विषबेल में मीठे-गुणकारी फलों की उम्मीद तो नहीं की जा सकती। मेरी निजी राय में न केवल बच्चों, अपितु वयस्कों के मामले में भी नियंत्रण होना चाहिये।

संविधान में स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का प्रावधान करने वालों की भावना यह कतई नहीं हो सकती कि भारत के नागरिकों को पोर्न-साइट्स देखने की आजादी मिलनी ही चाहिए। दूसरी बात, जो सामग्री सिर्फ वयस्कों के लिए है उसे बच्चे नहीं देखें ऐसा व्यवहार में संभव नहीं होता। यह देश और समाज के हित में होगा कि सरकार वांछनीय सामग्री को सुलभ करे और अवांछनीय सामग्री को पूरी तरह प्रतिबंधित न भी कर सके तो कम से कम उस तक पहुंच को कठिन करे।

यह देख कर शर्म ही महसूस होती है कि उत्तराखंड सहित बहुत से प्रदेशों की सरकारें शराब को गांव-गांव पहुंचाने के लिए तो प्रतिबद्ध दिखती हैं, जबकि पानी, बिजली, अस्पताल जैसी सुविधाओं के लिए लोग तरसते हैं। यदि सरकार द्वारा नियमन/नियंत्रण के नाम पर अपने अधिकार का दुरुपयोग की आशंका हो तो यह काम संसद या न्यायपालिका द्वारा या उनके निर्देशन/निगरानी में किया जा सकता है।
कमल जोशी, अल्मोड़ा

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