जातीय जनगणना के आंकड़े जारी करने के मुद्दे पर पटना की रैली में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कालिया नाग कहा। ऐसी अभद्रता भारतीय राजनीति में कोई नई बात नहीं है। यहां संसद, विधानसभाओं से लेकर शहरों, गांवों, कस्बों की सड़कों-चौराहों पर होने वाली रैलियों या विरोध-प्रदर्शनों के दौरान एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने, गाली-गलौच करने और पुतले फूंकने का चलन जिस तेजी से बढ़ रहा है उससे चिंता होती है। मुझे नहीं मालूम कि इंग्लैंड, अमेरिका सहित दूसरे देशों में ऐसी प्रथा है कि नहीं, लेकिन कभी सुनने-पढ़ने में नहीं आया कि सर्वोच्च संवैधानिक और प्रजातांत्रिक पदों/ संस्थाओं में विराजमान लोग इस तरह से विरोध जताते हैं। विरोध और मतभेद तो वहां भी होते ही हैं। क्या एक सभ्य देश और समाज में यह सब शोभा देता है?
इसी से जुड़ा सवाल है कि ऐसी भाषा और छोटी-छोटी बातों पर पुतला-दहन करने के पीछे क्या वजह है? क्या इसलिए बाध्य होना पड़ता है कि हमारा समाज सभ्य और शिष्ट तरीकों से प्रकट किए गए विरोध को अधिक महत्त्व नहीं देता। जोर से बोलो, चीखो-चिल्लाओ, गाली दो, लात-घूंसे चलाओ और जहां विरोधी के शरीर पर सीधे वार करने की संभावना सुरक्षा तंत्र के कारण संभव नहीं हो वहां उसके पुतले जलाओ! यदि यही कारण है तो समाज को शिक्षित करने की जरूरत है, समाज से ज्यादा मीडिया को।
मेरा सुझाव है कि प्रदूषण नियंत्रण की निगरानी करने वाले प्राधिकारियों को पुतला दहन प्रतिबंधित कर देना चाहिए। प्रधानमंत्रीजी ने 26 जुलाई को ‘मन की बात’ में स्वतंत्रता दिवस के भाषण के लिए देशवासियों से सुझाव आमंत्रित किए हैं। मेरा उन्हें यह भी सुझाव है कि वे संसद और उसके बाहर किसी भी सार्वजनिक मंच से विरोध-प्रदर्शन के दौरान भाषा और कृत्यों की मर्यादा का ध्यान रखने के बारे में अपील करें। उन्हें स्वयं भी मर्यादा का ध्यान रखना होगा, अपनी पार्टी के लोगों को भी सचेत करना होगा।
कमल कुमार जोशी, अल्मोड़ा
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