हम अपना खून पसीना एक करके पैसा कमाते हैं और उसके बाद कभी यातायात शुल्क तो कभी शिक्षा शुल्क, कभी जीवन बीमा और पता नहीं कौन-कौन से शुल्क हम गरीब देते हैं। अपना पेट चीर कर यह टैक्स रूपी कमाई हम कर्णधारों को इसलिए नहीं देते कि वे लोकतंत्र के मंदिर में आधुनिक राजनीतिक पुजारी बन सब कुछ बरबाद करते रहें!

अगर संसद में पक्ष-विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का खेल खत्म हो गया हो तो कुछ अब हम मासूम जनता के बारे में भी सोच लें हमारे कर्णधार।
पंकज कसरादे, मुलताई

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