जब देश आजाद हुआ था तो जनता और जनसेवकों में असीम उत्साह और जोश था। सैकड़ों वर्षों की दासता के चंगुल से छूट कर हम उन्मुक्त वातावरण में सांस लेने लग गए थे। दासता की कड़वी स्मृतियां धुंधली पड़ने लगी थीं। जनता को अपने नेताओं में विश्वास था और नेताओं को जनता में।
लेकिन ज्यों-ज्यों वक्त बीतता गया त्यों-त्यों इस विश्वास में कमी आती गई। या यों कहिए कि दुर्भाग्यवश इस विश्वास के आईने पर संशय, लोभ, अनीति, छल-प्रपंच, महत्त्वाकांक्षा आदि की धूल जमती गई। देश के सर्वोच्च ‘मंत्रणा-स्थल’ यानी संसद में आए दिन होने वाला शोरशराबा इसी खंडित विश्वास का नतीजा है।
शिबन कृष्ण रैणा, अलवर
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